नमस्ते मेरे प्यारे दोस्तों! कैसे हैं आप सब? आज मैं आपके साथ एक ऐसी कहानी साझा करना चाहता हूँ जिसने दशकों से न केवल इतिहासकारों को बल्कि आध्यात्मिक खोजियों को भी हैरत में डाल रखा है। हम बात कर रहे हैं 'एशिया के प्रेरित' कहे जाने वाले साधु सुंदर सिंह की।
क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि कुछ लोग इस दुनिया में सिर्फ एक मकसद के लिए आते हैं और जब वो मकसद पूरा हो जाता है, तो वे हवा में कपूर की तरह ओझल हो जाते हैं? सुंदर सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आज भी लोग पूछते हैं—क्या वह आज भी कहीं जीवित हैं? या फिर हिमालय की बर्फीली चोटियों ने उन्हें हमेशा के लिए अपनी गोद में सुला लिया?
साधु सुंदर सिंह का शुरुआती सफर
आईए अब जानते हैं उस इंसान के बारे में जिसने अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी को एक पल में छोड़ दिया। पंजाब के एक अमीर परिवार में जन्मे सुंदर सिंह का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। जहाँ तक वास्तविकता की बात है, उनकी माँ चाहती थीं कि वह एक साधु बनें, लेकिन सुंदर सिंह बचपन में ईसाई धर्म के सख्त खिलाफ थे। यहाँ तक कि उन्होंने बाइबिल भी जलाई थी। लेकिन कहते हैं न कि तकदीर को कुछ और ही मंजूर था। एक रात उन्हें ईसा मसीह का दर्शन हुआ और उनकी पूरी दुनिया ही बदल गई।
मैंने देखा है कि जब किसी का हृदय परिवर्तन होता है, तो वह समाज की परवाह करना छोड़ देता है। सुंदर सिंह ने भी यही किया। उन्होंने पीला चोला पहना और नंगे पैर निकल पड़े सुसमाचार सुनाने। उनका सबसे पसंदीदा इलाका था—तिब्बत।
तिब्बत की खतरनाक राहें और सुंदर सिंह
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं उस रहस्य की ओर जो साल 1929 में शुरू हुआ। तिब्बत उस समय 'निषिद्ध भूमि' (Forbidden Land) कहा जाता था। वहाँ जाना जान जोखिम में डालने जैसा था। न रास्ता, न खाने का ठिकाना, और ऊपर से हाड़ कंपा देने वाली ठंड।
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, जब इंसान के अंदर किसी काम का जुनून होता है, तो उसे मौत का डर नहीं लगता। सुंदर सिंह कई बार तिब्बत गए। उन्हें वहाँ कैद किया गया, जोकों से भरे गड्ढों में फेंका गया, लेकिन वह हर बार चमत्कारिक रूप से बचकर वापस आ जाते थे। लेकिन अप्रैल 1929 की वह सुबह कुछ अलग थी। वह अपनी आखिरी यात्रा पर निकले और फिर कभी लौटकर नहीं आए।
रहस्यमयी गुमशुदगी के पीछे के तर्क
अब सवाल यह उठता है कि आखिर उनके साथ क्या हुआ होगा? चलिए, कुछ तर्कों पर बात करते हैं जो अक्सर चर्चा में रहते हैं।
1. शारीरिक रूप से मृत्यु की संभावना
मुझे लगता है कि अगर हम वैज्ञानिक या तार्किक नजरिए से देखें, तो सुंदर सिंह उस समय शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके थे। उन्हें अल्सर की बीमारी थी और उनकी एक आँख की रोशनी भी कम हो गई थी। हिमालय की ऊँचाइयों पर ऑक्सीजन कम होती है और ठंड जानलेवा। बहुत से विद्वानों का मानना है कि शायद किसी बर्फीले तूफान में वह फंस गए होंगे या बीमारी की वजह से उनका शरीर साथ छोड़ गया होगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कभी उनका शव नहीं मिला।
2. हिमालय के सिद्ध पुरुषों के साथ निवास
यहाँ एक बहुत ही दिलचस्प मोड़ आता है। साधु सुंदर सिंह ने अपनी किताबों में 'कैलाश के महर्षि' का जिक्र किया है। उन्होंने बताया था कि हिमालय की कंदराओं में एक ऐसे प्राचीन ईसाई संत रहते हैं जिनकी उम्र सैंकड़ों साल है।
मेरे प्यारे दोस्तों, क्या यह मुमकिन है कि सुंदर सिंह भी उन्हीं सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में शामिल हो गए हों? कई लोग मानते हैं कि वह आज भी जीवित हैं और किसी गुप्त गुफा में ध्यान मग्न हैं। जहाँ तक वास्तविकता की बात है, इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है, लेकिन जो लोग अध्यात्म की गहराई को समझते हैं, वे इस बात को पूरी तरह खारिज भी नहीं करते।
3. क्या उन्हें शहीद कर दिया गया?
तिब्बत में उस समय अजनबियों का स्वागत अक्सर हथियारों से किया जाता था। सुंदर सिंह को पहले भी कई बार मारने की कोशिश की गई थी। एक कहानी तो यह भी है कि उन्हें एक सूखे कुएं में फेंक दिया गया था जिसका ढक्कन बंद कर दिया गया था, लेकिन तीन दिन बाद वह चमत्कारिक रूप से बाहर पाए गए। क्या इस बार किसी दुश्मन ने उन्हें मार दिया और शव को छिपा दिया?
साधु सुंदर सिंह: जीवित या अमर?
मैंने देखा है कि महान लोग कभी मरते नहीं हैं, वे बस हमारे बीच से चले जाते हैं। सुंदर सिंह की गुमशुदगी के बाद उनके मित्र सी.एफ. एंड्रयूज ने उन्हें खोजने की बहुत कोशिश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। 1932 में उन्हें आधिकारिक तौर पर मृत घोषित कर दिया गया, लेकिन उनके अनुयायी आज भी मानते हैं कि वह किसी न किसी रूप में मौजूद हैं।
मुझे लगता है कि सुंदर सिंह का गायब होना उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश था। वह हमेशा कहते थे कि "मैं इस दुनिया का नहीं हूँ।" शायद इसीलिए उन्होंने अपनी विदाई भी इतनी रहस्यमयी रखी कि कोई उन्हें ढूंढ न सके।
आईए अब जानते हैं उस प्रभाव के बारे में जो उन्होंने पीछे छोड़ा। आज भी उनके लिखे शब्द लोगों को प्रेरित करते हैं। उनकी सादगी, उनका साहस और उनकी निस्वार्थ सेवा—यही उनकी असली पहचान है। चाहे वह सशरीर जीवित हों या न हों, लेकिन उनके विचार और उनकी कहानियाँ आज भी लाखों दिलों में जिंदा हैं।
हिमालय की खामोशी में छिपा राज
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, हिमालय केवल पहाड़ों का समूह नहीं है, यह रहस्यों का भंडार है। सुंदर सिंह उस रहस्य का एक हिस्सा बन गए। लोग आज भी कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाते समय शायद यह उम्मीद करते होंगे कि कहीं न कहीं, किसी मोड़ पर उन्हें वह पीला चोला पहने हुए साधु दिख जाए।
अब अधिक समय न लेते हुए, मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि कुछ सवालों के जवाब न मिलना ही बेहतर होता है। सुंदर सिंह की गुमशुदगी हमें यह सिखाती है कि जीवन एक यात्रा है, और अंत में हम सब को उसी अनंत की ओर लौट जाना है।
मेरे प्यारे दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या साधु सुंदर सिंह वाकई में एक आम इंसान की तरह मृत्यु को प्राप्त हुए, या फिर वह उन विरले महापुरुषों में से थे जिन्होंने समय और मृत्यु पर विजय पा ली थी?
जहाँ तक वास्तविकता की बात है, सच तो केवल वे पहाड़ जानते हैं जिन्होंने उन्हें आखिरी बार जाते देखा था। मुझे लगता है कि सुंदर सिंह का रहस्य उनकी महानता को और बढ़ा देता है। उन्होंने अपने पीछे कोई स्मारक या कब्र नहीं छोड़ी, बल्कि एक ऐसी विरासत छोड़ी जो रूह को छू लेती है।
उम्मीद है आपको यह जानकारी अच्छी लगी होगी। फिर मिलेंगे एक और ऐसी ही दिलचस्प और रहस्यमयी कहानी के साथ। तब तक अपना ख्याल रखें और अपनी खोज जारी रखें!

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