मेरे प्यारे दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाना चाहता हूँ जो केवल धर्म या बदलाव की बात नहीं है, बल्कि एक इंसान के अपने वजूद को तलाशने की दास्तां है। जब हम किसी बड़े बदलाव की बात करते हैं, तो अक्सर हमें लगता है कि फैसला लेना ही सबसे बड़ा काम था। लेकिन सच तो यह है कि असली लड़ाई तो फैसला लेने के बाद शुरू होती है। आज हम बात कर रहे हैं साधु सुंदर सिंह के उन शुरुआती 30 दिनों की, जब उन्होंने लुधियाना के एक रईस सिख परिवार की सुख-सुविधाओं को छोड़कर मसीह की राह चुनी। कल्पना कीजिए, एक ऐसा नौजवान जिसके पास सब कुछ था—दौलत, इज्जत और एक रसूखदार परिवार—वह अचानक भगवा चोला पहनकर नंगे पैर निकल पड़ता है। अपनों से जुदाई और अकेलापन जहाँ तक वास्तविकता की बात है, सुंदर सिंह के लिए सबसे पहली और बड़ी चुनौती कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि उनका अपना परिवार था। मुझे लगता है कि जब आपका अपना खून ही आपका सबसे बड़ा विरोधी बन जाए, तो वह दर्द किसी भी शारीरिक चोट से ज्यादा गहरा होता है। उनके पिता और भाइयों ने उन्हें रोकने की हर मुमकिन कोशिश की। पहले प्यार से समझाया, फिर जायदाद का लालच दिया और अंत में घर से बाहर निकाल दिया। ज...