नमस्ते मेरे प्यारे दोस्तों! कैसे हैं आप सब? आज मैं आपके साथ एक ऐसी कहानी साझा करने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर शायद आपकी रूह कांप जाए, लेकिन साथ ही आपको यह भी अहसास होगा कि जब सब रास्ते बंद हो जाते हैं, तो ऊपर वाला कोई न कोई रास्ता जरूर खोलता है।
अक्सर हम फिल्मों में चमत्कार देखते हैं और हमें लगता है कि ये सब सिर्फ पर्दे तक ही सीमित है। लेकिन जहां तक वास्तविकता की बात है, इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जिन्हें विज्ञान आज भी नहीं समझा पाया है। ऐसी ही एक कहानी है भारत के महान संत साधु सुंदर सिंह की।
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और जानते हैं तिब्बत के उस रहस्यमयी और डरावने 'हड्डियों वाले गड्ढे' के बारे में, जहाँ से सुंदर सिंह का बचना किसी अजूबे से कम नहीं था।
तिब्बत की दुर्गम राहें और साधु सुंदर सिंह का जुनून
दोस्तों, बात उन दिनों की है जब तिब्बत दुनिया के लिए एक रहस्य बना हुआ था। वहां बाहरी लोगों का जाना लगभग नामुमकिन था, और अगर कोई ईसाई धर्म का प्रचार करते पकड़ा जाता, तो उसे सीधे मौत की सजा दी जाती थी। लेकिन साधु सुंदर सिंह, जिन्हें 'हिमालय का प्रेरित' भी कहा जाता है, उनके दिल में एक अलग ही आग थी।
मैंने कहीं पढ़ा था कि सुंदर सिंह बचपन से ही सत्य की तलाश में थे। उन्होंने भगवा चोला पहना था, लेकिन उनके हाथ में बाइबल होती थी। वे नंगे पैर बर्फीले पहाड़ों पर चलते थे। सोचिए, जहाँ हम दो स्वेटर पहनकर भी कांपते हैं, वहां वो शख्स सिर्फ एक पतली चादर लपेटे मीलों पैदल चलता था। उनका मकसद था—शांति का संदेश पहुंचाना।
रासार का वो 'हड्डियों वाला गड्ढा' जिसे सुनकर दिल बैठ जाए
तिब्बत के एक शहर 'रासार' में सुंदर सिंह प्रचार कर रहे थे। वहां के लामाओं (बौद्ध भिक्षुओं) को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने सुंदर सिंह को पकड़ लिया और वहां के राजा के सामने पेश किया। सजा क्या थी? मौत। लेकिन ये कोई साधारण मौत नहीं थी।
वहां एक ऐसा गड्ढा था जिसे 'मौत का कुआं' या 'हड्डियों वाला गड्ढा' कहा जाता था। अब आप कल्पना कीजिए, एक ऐसा गहरा अंधेरा कुआं, जिसे सालों से खोला न गया हो। उस गड्ढे के ऊपर एक भारी ढक्कन होता था और उस पर ताला लगा रहता था। उस ताले की चाबी सिर्फ वहां के मुख्य लामा के पास होती थी।
जैसा कि मैंने अनुभव किया है या कहानियों में सुना है, उस समय के दंड बहुत ही क्रूर होते थे। उस गड्ढे में उन लोगों को फेंक दिया जाता था जिन्हें तड़पा-तड़पा कर मारना होता था। वहां न रोशनी थी, न हवा, बस नीचे उन लोगों की सड़ी-गली लाशें और हड्डियां थीं जो पहले वहां फेंके गए थे।
मौत के साए में बिताए वो तीन भयानक दिन
राजा के आदेश पर सुंदर सिंह को उस अंधेरे गड्ढे में नीचे फेंक दिया गया। ऊपर से भारी ढक्कन बंद कर दिया गया और ताला लगा दिया गया। सुंदर सिंह जब नीचे गिरे, तो उनका हाथ फ्रैक्चर हो गया।
अब जरा रुकिए और सोचिए—चारों तरफ घुप्प अंधेरा, सड़ी हुई लाशों की भयंकर बदबू जो सांस लेना दूभर कर दे, और हाथ की असहनीय पीड़ा। मुझे लगता है कि कोई भी सामान्य इंसान वहां चंद मिनटों में ही दम तोड़ देता या डर के मारे पागल हो जाता। लेकिन साधु सुंदर सिंह अलग मिट्टी के बने थे।
आईए अब जानते हैं कि उस गड्ढे के अंदर क्या हुआ। तीन दिन बीत गए। सुंदर सिंह को भूख और प्यास ने बेहाल कर दिया था। उस नरक जैसी जगह में उन्होंने सिर्फ प्रार्थना का सहारा लिया। उन्हें लगा कि शायद उनकी यात्रा यहीं खत्म होने वाली है। लाशों के बीच लेटे हुए, उन्होंने अपना सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया।
एक अनसुना चमत्कार: अंधेरी रात में आई वो रस्सी
तीसरी रात को कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद खुद सुंदर सिंह को भी नहीं थी। अचानक ऊपर से कुछ सरसराहट सुनाई दी। उन्हें लगा कि शायद कोई और नया शिकार फेंका जा रहा है। लेकिन नहीं! ऊपर का ढक्कन खुला और एक रस्सी नीचे आई।
सुंदर सिंह ने अपने ठीक हाथ से उस रस्सी को पकड़ा और उसे अपने शरीर के चारों ओर लपेट लिया। उन्हें महसूस हुआ कि कोई ऊपर से उन्हें बहुत ताकत के साथ खींच रहा है। धीरे-धीरे वे उस गड्ढे से बाहर आए। ठंडी हवा के झोंके जब उनके चेहरे पर लगे, तो उन्हें अहसास हुआ कि वे जिंदा हैं।
बाहर आते ही वे जमीन पर गिर पड़े। जब तक वे संभलते और ऊपर देखते कि उन्हें किसने बचाया, वहां कोई नहीं था। वह शख्स गायब हो चुका था। ऊपर का ढक्कन फिर से बंद था और ताला लगा हुआ था।
जब राजा के उड़े होश: ताला बंद और कैदी बाहर!
अगले दिन सुबह, सुंदर सिंह फिर से शहर के बाजार में जाकर प्रचार करने लगे। जब वहां के लोगों और सैनिकों ने उन्हें देखा, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। "ये आदमी तो गड्ढे में मर जाना चाहिए था, ये बाहर कैसे आया?"
यह खबर बिजली की तरह राजा तक पहुंची। सुंदर सिंह को दोबारा दरबार में लाया गया। राजा गुस्से से लाल-पीला हो गया। उसने चिल्लाकर पूछा, "तुम्हें वहां से किसने निकाला? चाबी तो लामा के पास थी!"
जब लामा से उसकी कमर पर लटकी चाबियां मांगी गईं, तो सब हैरान रह गए। ताला अभी भी बंद था और चाबियां लामा के पास सुरक्षित थीं। मैंने देखा है कि जब चमत्कार होते हैं, तो तर्क और विज्ञान धरे के धरे रह जाते हैं। राजा डर गया। उसे लगा कि सुंदर सिंह के पास कोई दैवीय शक्ति है। डर के मारे उसने सुंदर सिंह को वहां से जाने की इजाजत दे दी।
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
मेरे प्यारे दोस्तों, साधु सुंदर सिंह की ये कहानी सिर्फ एक धार्मिक किस्सा नहीं है। यह हमें सिखाती है 'हिम्मत' और 'भरोसा'। कभी-कभी हमारी जिंदगी भी उस 'हड्डियों वाले गड्ढे' जैसी हो जाती है। हमें लगता है कि चारों तरफ अंधेरा है, बीमारियां हैं, असफलता की बदबू है और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है।
लेकिन जैसा कि सुंदर सिंह के साथ हुआ, जब हम पूरी तरह हार मान लेते हैं और खुद को किसी बड़ी शक्ति के हवाले कर देते हैं, तो कोई न कोई 'रस्सी' जरूर नीचे आती है। वह रस्सी किसी दोस्त की मदद के रूप में हो सकती है, किसी अजनबी की सलाह के रूप में या फिर अचानक बदले हुए हालात के रूप में।
मुझे लगता है, आज के इस भागदौड़ भरे 'डिजिटल' दौर में (ओह, माफी चाहता हूँ, मैंने कहा था कि ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करूँगा), मतलब आज के इस तनावपूर्ण समय में हमें सुंदर सिंह जैसा अटूट विश्वास चाहिए।
चलते-चलते कुछ आखिरी बातें
तिब्बत की वो हड्डियां और वो गड्ढा आज भी वहां कहीं होंगे या नहीं, ये तो मैं नहीं जानता। लेकिन सुंदर सिंह की ये गवाही आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देती है। उन्होंने साबित कर दिया कि नफरत और सजा से किसी की रूह को नहीं मारा जा सकता।
तो दोस्तों, अगर आज आप भी किसी मुश्किल में हैं, तो बस ये याद रखिएगा कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, सवेरा होना तय है। बस अपनी प्रार्थना और अपनी कोशिशों की रस्सी को मजबूती से थामे रखिएगा।
उम्मीद है आपको साधु सुंदर सिंह के जीवन का यह अद्भुत हिस्सा पसंद आया होगा। अगर आपके पास भी ऐसी कोई चमत्कारिक कहानी है या आपने कभी ऐसा कुछ अनुभव किया है, तो मुझे जरूर बताइएगा।
जल्द ही मिलते हैं एक नए और दिलचस्प किस्से के साथ! तब तक अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें