मेरे प्यारे दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे बड़ी और मशहूर यूनिवर्सिटी में अगर कोई भगवा कपड़े पहने, नंगे पैर चलने वाला इंसान पहुँच जाए, तो वहाँ का माहौल कैसा होगा? आज मैं आपको एक ऐसी ही सच्ची और अद्भुत कहानी सुनाने जा रहा हूँ। यह कहानी है भारत के एक ऐसे संत की, जिन्होंने अपने सादे शब्दों से ऑक्सफोर्ड जैसे बड़े संस्थान के विद्वानों को भी हैरान कर दिया था।
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और इतिहास के पन्नों से इस खूबसूरत कहानी को बाहर निकालते हैं।
लुधियाना के एक अमीर सिख परिवार से 'ईसाई साधु' बनने तक का कठिन सफर
आईए अब जानते हैं कि यह कहानी शुरू कहाँ से होती है। बात काफी पुरानी है। पंजाब के लुधियाना शहर में एक बहुत ही रईस सिख परिवार रहता था। सुख-सुविधा, पैसे और ऐशो-आराम की कोई कमी नहीं थी। इसी परिवार में साल 1889 में एक लड़के का जन्म हुआ, जिसका नाम परिवार वालों ने सुंदर सिंह रखा। बचपन से ही सुंदर सिंह को धर्म और भगवान के बारे में जानने की बहुत इच्छा रहती थी। उनकी माँ उन्हें हमेशा अच्छे संस्कार देती थीं और साधु-संतों की संगति में ले जाती थीं।
लेकिन जब सुंदर सिंह थोड़े बड़े हुए, तो उनकी माँ का निधन हो गया। इस घटना ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। उनके मन में बहुत गुस्सा भर गया। वे इतने नाराज रहने लगे कि उन्होंने अपने घर में रखी ईसाई धर्म की एक किताब (बाइबिल) तक को आग के हवाले कर दिया। उन्हें लगता था कि दुनिया में कोई भगवान नहीं है और अगर है, तो वह उन्हें शांति क्यों नहीं दे रहा है।
लेकिन फिर उनकी जिंदगी में एक रात ऐसी आई, जिसने सब कुछ बदल दिया। सुंदर सिंह ने तय किया था कि अगर उन्हें भगवान नहीं मिले, तो वे सुबह रेल की पटरी पर अपनी जान दे देंगे। कहते हैं कि उसी रात उन्हें ईसा मसीह का एक दिव्य दर्शन हुआ। उस एक पल ने लुधियाना के उस गुस्सैल और अमीर लड़के को पूरी तरह से बदल कर रख दिया।
सुंदर सिंह ने अपना घर-बार, सारी दौलत और ऐशो-आराम हमेशा के लिए छोड़ दिया। उन्होंने सिर्फ एक पतला सा भगवा चोला पहन लिया और तय किया कि वे एक साधु का जीवन जिएंगे। यह सफर उनके लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। उनके अपने परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया। उन्हें जहर तक दिया गया, लेकिन वे बच गए। वे नंगे पैर ही पूरे देश में, और यहाँ तक कि तिब्बत और हिमालय की खतरनाक बर्फीली वादियों में भी घूमने लगे। मैंने देखा है कि जब इंसान के भीतर कोई सच्ची लगन लग जाती है, तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत अपनी मंजिल से पीछे नहीं हटा सकती।
भगवा चोले में एक देसी साधु का विलायत जाना
साधु सुंदर सिंह की सादगी, उनका ज्ञान और उनके प्यार की चर्चा धीरे-धीरे सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में फैलने लगी। लोग उनकी बातें सुनने के लिए दूर-दूर से आते थे। जहाँ तक वास्तविकता की बात है, उस समय अंग्रेजों का भारत पर राज था। अंग्रेज खुद को बहुत पढ़ा-लिखा और सभ्य मानते थे। लेकिन जब इंग्लैंड के लोगों ने एक भारतीय साधु के बारे में सुना, तो उन्होंने सुंदर सिंह को अपने देश आने का न्योता दिया।
जब वे पहली बार इंग्लैंड पहुँचे, तो वहाँ के लोग उन्हें देखकर एकदम हैरान रह गए। अंग्रेज लोग तो हमेशा सूट-बूट में रहते थे, टाई लगाते थे और चमचमाते जूते पहनते थे। और उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था जो कड़ाके की ठंड में भी सिर्फ एक पतला सा सूती भगवा कपड़ा पहने था और पैरों में जूते तक नहीं थे। इंग्लैंड की सड़कों पर बहुत से लोगों ने उन्हें अजीब नजरों से देखा। कुछ ने तो उनका मज़ाक भी उड़ाया। उन्हें लगा कि यह गरीब सा दिखने वाला इंसान हमें क्या नई बात सिखाएगा।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का वह ऐतिहासिक भाषण
फिर वह दिन आया जिसका शायद इतिहास को भी इंतज़ार था। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, जहाँ दुनिया के सबसे तेज दिमाग वाले लोग पढ़ते और पढ़ाते हैं, वहाँ साधु सुंदर सिंह को एक भाषण देने के लिए बुलाया गया।
हॉल पूरी तरह से खचाखच भरा हुआ था। बड़े-बड़े प्रोफेसर, विद्वान, पादरी और छात्र वहाँ बैठे थे। सबके चेहरों पर एक अजीब सी उत्सुकता थी। कुछ लोगों के मन में थोड़ा अहंकार भी था कि आखिर यह देसी साधु हमें क्या नई बात बता देगा जो हम किताबों में नहीं पढ़ चुके हैं।
जैसे ही साधु सुंदर सिंह मंच पर आए, पूरे हॉल में एकदम सन्नाटा छा गया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर गजब की शांति। उन्होंने कोई बहुत मुश्किल या भारी-भरकम अंग्रेजी के शब्द नहीं बोले। उन्होंने कोई किताबी ज्ञान भी नहीं झाड़ा। उनका बात करने का तरीका एकदम सीधा, सच्चा और दिल को छू लेने वाला था।
पानी और प्यास की वह अद्भुत कहानी
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, बड़ी-बड़ी बातें समझाने के लिए अक्सर छोटी और प्यारी कहानियों की जरूरत होती है। साधु सुंदर सिंह ने भी ऑक्सफोर्ड के उस मंच पर बिल्कुल यही तरीका अपनाया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड के उन पढ़े-लिखे विद्वानों को एक बहुत ही साधारण सी कहानी सुनाई।
उन्होंने भरी सभा में कहा, "एक बार की बात है, एक आदमी बहुत ज्यादा बीमार था और उसे बहुत तेज प्यास लगी थी। वह लगभग मरने की हालत में था। एक दूसरा भला आदमी उसके पास पानी लेकर आया। लेकिन उसने वह पानी एक बहुत ही साधारण और सस्ते से प्याले में रखा था। बीमार आदमी ने उस पानी को देखकर कहा कि मैं यह पानी नहीं पीऊंगा क्योंकि यह प्याला बिल्कुल भी सुंदर नहीं है। मुझे तो सोने या चाँदी के खूबसूरत प्याले में ही पानी चाहिए।"
साधु जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "वह आदमी प्यास से तड़प-तड़प कर मर गया, लेकिन उसने उस साधारण प्याले से वह पानी नहीं पिया। आप यूरोप के लोग भी मुझे कुछ ऐसे ही लगते हैं।"
यह सुनते ही हॉल में बैठे लोग चौंक गए। साधु सुंदर सिंह ने आगे कहा, "आप लोग धर्म, शांति और सच्चाई को सिर्फ सोने-चाँदी के प्यालों में पीना चाहते हैं। आप बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स, दिखावा, महँगे कपड़े और किताबी ज्ञान को ही सब कुछ मानते हैं। मैं आपके पास वही जीवन देने वाला पानी एक बहुत ही साधारण से 'भारतीय प्याले' (यानी खुद की तरफ इशारा करते हुए) में लेकर आया हूँ। पानी वही है जो आपकी जान बचा सकता है। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप उस पानी को पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं, या फिर मेरे इस साधारण से रूप और प्याले की सजावट देखकर इसे ठुकरा देते हैं।"
सन्नाटे में बदल गया ऑक्सफोर्ड का घमंड
मेरे प्यारे दोस्तों, आप यकीन नहीं मानेंगे, यह बात सुनकर पूरे हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया कि अगर एक सुई भी गिरे तो उसकी आवाज सुनाई दे जाए। उन बड़े-बड़े प्रोफेसरों के पास इस बात का कोई जवाब ही नहीं था। उनके पास दुनिया भर की डिग्रियां थीं, लेकिन उस दिन एक नंगे पैर वाले साधु ने उन्हें जिंदगी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया था।
साधु सुंदर सिंह ने उन्हें सीधे शब्दों में बता दिया था कि सच्चाई और सच्चा ज्ञान किसी महँगे सूट, टाई या बड़ी डिग्री का मोहताज नहीं होता। ऑक्सफोर्ड के विद्वानों ने उस दिन दिल से यह महसूस किया कि उनके पास दुनिया जहान की जानकारी तो बहुत है, लेकिन शायद उस ज्ञान में वह रूहानी शांति और सुकून नहीं है जो इस सीधे-सादे भारतीय साधु के पास है।
उस दिन के बाद से अंग्रेजों का नजरिया साधु सुंदर सिंह के प्रति पूरी तरह से बदल गया। वे समझ गए कि यह कोई मामूली इंसान नहीं है, बल्कि एक ऐसा संत है जिसने जीवन की असली सच्चाई को पा लिया है। अगले दिन अखबारों में उनकी चर्चा होने लगी और लोग उनके पीछे-पीछे चलने लगे। उन्होंने इंग्लैंड, अमेरिका और दुनिया के कई देशों की यात्रा की, लेकिन अपना वह साधारण सा भगवा चोला और नंगे पैर चलने की आदत कभी नहीं छोड़ी।
सादगी ही सबसे बड़ी ताकत है
मुझे लगता है कि साधु सुंदर सिंह की यह कहानी हमें आज के समय में भी बहुत कुछ सिखाती है। आज के दौर में हम लोग अक्सर बाहरी दिखावे के पीछे अंधों की तरह भागते रहते हैं। हम सोचते हैं कि महँगे कपड़े पहनने से, बड़ी गाड़ी में घूमने से या सोशल मीडिया पर दिखावा करने से लोग हमारी इज्जत करेंगे। हम भूल जाते हैं कि असली खुशी और शांति हमारे भीतर है, हमारे सादेपन में है।
लुधियाना के एक अमीर घर से निकलकर, ऐशो-आराम को ठोकर मारकर, नंगे पैर पूरी दुनिया नापने वाले इस संत ने यह साबित कर दिया कि अगर आपके शब्दों में सच्चाई है और आपका दिल साफ है, तो ऑक्सफोर्ड क्या, पूरी दुनिया आपको बैठकर सुनेगी। आपके पास क्या है यह मायने नहीं रखता, आप भीतर से क्या हैं, यह सबसे ज्यादा मायने रखता है।
तो दोस्तों, अगली बार जब भी आपको लगे कि आप बहुत साधारण हैं, या आपके पास दुनिया को दिखाने के लिए कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, तो साधु सुंदर सिंह के उस 'साधारण भारतीय प्याले' को जरूर याद कर लीजिएगा। सच्चाई को किसी सजावट की जरूरत नहीं होती, वह अपने आप में ही बहुत खूबसूरत होती है।

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