मेरे प्यारे दोस्तों,
आज मैं आपके साथ एक ऐसी शख्सियत की कहानी साझा करना चाहता हूँ जिसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। जब मैंने पहली बार साधु सुंदर सिंह के बारे में पढ़ा, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ एक धर्म बदलने वाले व्यक्ति की कहानी है। लेकिन जैसे-जैसे मैं उनकी जिंदगी की गहराइयों में गया, मुझे समझ आया कि यह तो प्यार और एक अटूट खोज की दास्तां है।
लुधियाना के एक बेहद अमीर और रसूखदार सिख परिवार में जन्मे सुंदर सिंह के पास वह सब कुछ था जिसका लोग सपना देखते हैं। रेशमी कपड़े, बड़ा बंगला और समाज में ऊंचा नाम। लेकिन उनके मन में एक अजीब सी छटपटाहट थी। वह शांति की तलाश में थे, जो उन्हें न तो दौलत में मिल रही थी और न ही उस समय के धार्मिक रीति-रिवाजों में।
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, अक्सर जब इंसान के पास सब कुछ होता है, तभी उसे सबसे ज्यादा खालीपन महसूस होता है। सुंदर सिंह के साथ भी यही हुआ।
उस रात का वो मंजर जिसने सब बदल दिया
एक रात ऐसी आई जब उन्होंने तय कर लिया कि अगर आज ईश्वर नहीं मिला, तो वह अपनी जान दे देंगे। उन्होंने रेल की पटरी पर लेटकर जान देने की ठान ली थी। लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसे आज भी लोग एक चमत्कार मानते हैं। उन्हें ईसा मसीह का दीदार हुआ। वह कोई धर्म की किताब पढ़कर नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत अनुभव से बदले थे।
अब यहाँ से शुरू होता है असली संघर्ष। उनके परिवार ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की। उन्हें जहर तक दिया गया, घर से निकाल दिया गया। कल्पना कीजिए, एक लड़का जो कल तक मखमली गद्दों पर सोता था, आज वह नंगे पैर सड़कों पर था। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। उन्होंने भगवा चोला पहना और एक हाथ में बाइबिल लेकर निकल पड़े।
"मैं ईसाई धर्म का प्रचार नहीं, मसीह का प्रचार करता हूँ"
जब वह प्रचार करने लगे, तो बहुत से लोगों ने उन्हें टोकना शुरू किया। पश्चिमी देशों के मिशनरी उन्हें अपने तरीके से ढालना चाहते थे। वे चाहते थे कि सुंदर सिंह कोट-पेंट पहनें और चर्च के खास नियमों के हिसाब से चलें।
यहीं पर उन्होंने वह ऐतिहासिक बात कही थी: **"मैं ईसाई धर्म का प्रचार नहीं, मसीह का प्रचार करता हूँ।"**
आईए अब जानते हैं कि उनके इस वाक्य का असल मतलब क्या था। जहाँ तक वास्तविकता की बात है, सुंदर सिंह ने बहुत गहराई से यह देखा था कि लोग 'धर्म' के नाम पर अक्सर दीवारों में कैद हो जाते हैं। ईसाई धर्म उस समय भारत में एक 'विदेशी मजहब' की तरह देखा जाता था। लोग इसे अंग्रेजों का धर्म मानते थे।
सुंदर सिंह का कहना था कि मसीह (Jesus) किसी एक देश या संस्कृति की जागीर नहीं हैं। उन्होंने एक बहुत ही खूबसूरत उदाहरण दिया था। उन्होंने कहा, "जब आप प्यासे को पानी देते हैं, तो प्यासा पानी पीता है, वह उस बर्तन को नहीं देखता जिसमें पानी दिया जा रहा है। ईसाई धर्म वह बर्तन है, लेकिन मसीह वह जीवन देने वाला पानी है।"
मुझे लगता है कि यह बात आज के दौर में भी कितनी सटीक बैठती है। हम अक्सर लेबल और टैग्स के पीछे भागते हैं, जबकि असलियत तो उस रूहानी सुकून में है जो बिना किसी भेदभाव के मिलता है।
तिब्बत की दुर्गम घाटियाँ और वह अटूट विश्वास
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और उनके सबसे साहसी कारनामों की बात करते हैं। सुंदर सिंह को तिब्बत जाने का बहुत शौक था। उस समय तिब्बत में ईसाई शिक्षाओं का प्रचार करना मौत को बुलावा देना था। लेकिन उन्हें कोई डर नहीं था।
मैंने देखा है कि जब इंसान को अपनी मंजिल मिल जाती है, तो उसे कांटों से डर नहीं लगता। वह कई बार तिब्बत गए। उन्हें वहां कोड़ों से पीटा गया, सूखे कुएँ में डाल दिया गया जहाँ सड़ी-गली लाशें पड़ी थीं। लेकिन वह वहाँ भी प्रार्थना करते रहे। लोग उन्हें देखकर हैरान रह जाते थे कि एक इंसान इतनी तकलीफ में भी मुस्कुरा कैसे सकता है?
उनकी कहानी हमें सिखाती है कि धर्म सिर्फ रविवार को चर्च जाने या माथा टेकने का नाम नहीं है। यह एक ऐसा रिश्ता है जिसे आप हर पल जीते हैं। उन्होंने कभी नहीं चाहा कि लोग 'ईसाई' कहलाने के लिए अपनी संस्कृति छोड़ दें। वह कहते थे कि एक भारतीय को भारतीय रहते हुए ही ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए।
बनावटीपन से कोसों दूर एक सादा जीवन
सुंदर सिंह का व्यक्तित्व एकदम सरल था। वह जहाँ भी जाते, अपनी सादगी से लोगों का दिल जीत लेते। उनके पास कोई बड़ी टीम नहीं थी, कोई बड़ा बैंक बैलेंस नहीं था। बस एक लगन थी।
मुझे एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा है। एक बार वह यूरोप की यात्रा पर थे। वहाँ के लोगों ने उन्हें बहुत सम्मान दिया। लेकिन उन्होंने देखा कि पश्चिमी देशों के लोग भौतिक सुख-सुविधाओं में इतने खो गए हैं कि वे असली मसीहियत को भूल चुके हैं। उन्होंने बड़ी बेबाकी से उनसे कहा कि तुम लोग धर्म की लाश को ढो रहे हो, जबकि तुम्हें जिंदा मसीह की जरूरत है।
यही वह फर्क है जो उन्हें एक आम प्रचारक से अलग बनाता है। वह सच बोलने से कभी नहीं कतराते थे।
वह आखिरी सफर जिसका राज आज भी बरकरार है
1929 में सुंदर सिंह एक बार फिर तिब्बत के लिए निकले। उस समय उनकी सेहत ठीक नहीं थी, लेकिन उनके अंदर की आग उन्हें रुकने नहीं दे रही थी। वह हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों में चले गए और उसके बाद... वह कभी वापस नहीं लौटे।
किसी को नहीं पता कि उनका अंत कैसे हुआ। कुछ कहते हैं कि वह शहीद हो गए, कुछ मानते हैं कि वह किसी गुफा में ध्यान में लीन हो गए। लेकिन सच तो यह है कि उनका शरीर भले ही ओझल हो गया हो, उनके विचार आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं।
मेरे प्यारे दोस्तों, साधु सुंदर सिंह की जिंदगी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी अपनी मान्यताओं के लिए इतने पक्के हैं? उन्होंने सिखाया कि असली शांति किसी संगठन का हिस्सा बनने में नहीं, बल्कि उस ईश्वर को अपने दिल में महसूस करने में है।
वह अक्सर कहते थे, "जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हम ईश्वर के हाथों में एक छोटा सा औजार बन सकें।" उन्होंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। लुधियाना का वह अमीर लड़का वाकई में एक 'ईसाई साधु' बनकर अमर हो गया।
उम्मीद है कि आपको सुंदर सिंह के जीवन का यह सफर पसंद आया होगा। मुझे तो उनकी कहानी हर बार एक नई ऊर्जा देती है। क्या आपको भी लगता है कि आज हमें भी धर्मों की दीवारों से ऊपर उठकर इंसानियत और रूहानियत की बात करनी चाहिए? मुझे अपनी राय जरूर बताइएगा।

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