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साधु धुसुंदर सिंह की 1929 की आखिरी यात्रा: क्या हुआ था उस बर्फीले तूफान में

मेरे प्यारे दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ जो आपको बर्फ की उन ठंडी वादियों में ले जाएगी, जहाँ से लौटना शायद मुमकिन नहीं था। हम बात कर रहे हैं साधु सुंदर सिंह की—एक ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिमालय की गोद में और प्रभु की सेवा में बिता दिया। जहाँ तक वास्तविकता की बात है, उनकी कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं लगती।

saadhu dhusundar sinh kee 1929 kee aakhiree yaatra: kya hua tha us barpheele toophaan mein


जैसा कि मैंने अनुभव किया है, जब भी हम किसी के गायब होने की बात करते हैं, तो मन में कई सवाल उठते हैं। लेकिन साधु सुंदर सिंह का गायब होना महज़ एक घटना नहीं, बल्कि एक रहस्य बन गया जिसे आज तक कोई नहीं सुलझा सका। आइए अब जानते हैं कि आखिर उस 1929 की आखिरी यात्रा में हुआ क्या था।

हिमालय का वो बुलावा

साधु सुंदर सिंह को हिमालय से एक अलग ही लगाव था। वे अक्सर कहते थे कि पहाड़ों की शांति में उन्हें ईश्वर की आवाज़ सुनाई देती है। कई बार वे नंगे पैर, पतले से भगवा कपड़े पहनकर बर्फबारी के बीच निकल जाते थे। लोगों ने उन्हें कई बार मना किया, "महाराज, ऊपर बहुत ठंड है, मत जाइए।" पर उनका जवाब हमेशा एक प्यारी सी मुस्कान होती थी।

मुझे लगता है कि 1929 की उस अप्रैल की सुबह भी कुछ ऐसी ही रही होगी। उनकी सेहत बहुत अच्छी नहीं थी। उनकी आँखों की रोशनी कम हो रही थी और शरीर पहले जैसा साथ नहीं दे रहा था। फिर भी, उनके अंदर एक तड़प थी—तिब्बत जाने की। तिब्बत, जहाँ जाना उस वक्त मौत को दावत देने जैसा था।

आखिरी विदाई और वो बर्फीला रास्ता

अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं उस दिन की ओर, जब वे आखिरी बार देखे गए। अप्रैल का महीना था, कड़कड़ाती ठंड अभी गई नहीं थी। साधु सुंदर सिंह ने सुबाथू (हिमाचल प्रदेश) से अपनी यात्रा शुरू की। उनके साथ कुछ दोस्त भी थे जो उन्हें कुछ दूर तक छोड़ने आए थे।

मैंने देखा है कि जब कोई इंसान अपनी मंजिल की ओर बढ़ता है, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती है। उनके साथियों ने बताया कि सुंदर सिंह के चेहरे पर वही शांति थी। उन्होंने अलविदा कहा और अकेले ही उन ऊँचे पहाड़ों की ओर बढ़ गए। किसी को नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी विदाई है।

क्या हुआ था उस बर्फीले तूफान में?

हिमालय का मौसम पल भर में बदल जाता है। एक पल धूप होती है, तो दूसरे ही पल आसमान काला पड़ जाता है और ऐसी बर्फ गिरती है कि हाथ को हाथ नहीं सुझाई देता। जानकार बताते हैं कि उस साल अप्रैल के आखिरी हफ्तों में मौसम बहुत ज्यादा खराब हो गया था।

कल्पना कीजिए, एक अकेला इंसान, जिसकी तबीयत खराब है, जो ठीक से देख नहीं पा रहा, वो 15,000-16,000 फीट की ऊँचाई पर एक भयानक बर्फीले तूफान में फँस गया हो। चारों तरफ सफ़ेद चादर, हाड़ कपा देने वाली हवाएँ और रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं।

क्या वे किसी गुफा में शरण ले पाए? या फिर उस ठंडी हवा ने उनके फेफड़ों को जाम कर दिया? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब आज भी हिमालय की चोटियों के पास ही कहीं दबा हुआ है।

तलाश की कोशिशें और गहराता रहस्य

जब काफी समय बीत गया और साधु सुंदर सिंह वापस नहीं लौटे, तो उनके चाहने वालों में बेचैनी बढ़ने लगी। सरकार और मिशनरी संस्थाओं ने उनकी तलाश में टीमें भेजीं। उन रास्तों की खाक छानी गई जहाँ से वे अक्सर गुजरते थे।

लेकिन ताज्जुब की बात देखिए, न तो उनका कोई सामान मिला, न उनका कोई निशान। आमतौर पर अगर कोई पहाड़ों में दुर्घटना का शिकार होता है, तो कहीं न कहीं कुछ अवशेष मिल जाते हैं। पर सुंदर सिंह के मामले में ऐसा लगा जैसे हिमालय ने उन्हें अपनी गोद में पूरी तरह समेट लिया हो।

कुछ लोग कहते हैं कि वे तिब्बत पहुँच गए थे और वहाँ के किसी मठ में रहने लगे। कुछ का मानना है कि उन्होंने 'समाधि' ले ली। पर हकीकत तो यही है कि 1929 के उस तूफान के बाद उन्हें फिर कभी किसी ने नहीं देखा।

सुंदर सिंह के जीवन से जुड़ी छोटी सी बात

यहाँ मुझे एक किस्सा याद आता है जो उनके बारे में बहुत मशहूर है। एक बार वे अपने एक साथी के साथ पहाड़ चढ़ रहे थे। बहुत बर्फ गिर रही थी। रास्ते में उन्हें एक आदमी मिला जो ठंड से मर रहा था। सुंदर सिंह के साथी ने कहा, "अगर हम इसे उठाएंगे, तो हम खुद मर जाएंगे। हमें आगे बढ़ना चाहिए।"

लेकिन सुंदर सिंह नहीं माने। उन्होंने उस मरते हुए आदमी को अपनी पीठ पर लाद लिया। भारी बोझ और मेहनत की वजह से सुंदर सिंह का शरीर गर्म होने लगा। उस गर्मी ने न सिर्फ उन्हें बचाया, बल्कि उस बीमार आदमी की जान भी बच गई। वहीं उनका वो साथी, जो अकेला आगे बढ़ गया था, आगे चलकर जम गया और उसकी मौत हो गई।

यही थे साधु सुंदर सिंह—दूसरों के लिए खुद को झोंक देने वाले।

आखिर सुंदर सिंह हमारे लिए क्या छोड़ गए?

भले ही वे 1929 में गायब हो गए, लेकिन उनकी शिक्षाएँ और उनका जीवन आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है। वे सिखा गए कि शांति महज़ शोर की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि आपके अंदर की एक स्थिति है।

आज भी जब कोई सुसाथु जाता है या हिमालय की उन चोटियों को देखता है, तो मन में एक बार जरूर आता है—"कहीं साधु जी यहीं आसपास तो नहीं?"

उनका गायब होना आज भी एक पहेली है। लेकिन शायद वे यही चाहते थे। एक ऐसा अंत, जो किसी अंत जैसा न लगे, बल्कि एक अनंत यात्रा की शुरुआत हो। हिमालय ने अपने एक सच्चे प्रेमी को हमेशा के लिए अपने पास रख लिया।

तो दोस्तों, यह थी साधु सुंदर सिंह की वो रहस्यमयी आखिरी यात्रा। आपको क्या लगता है? क्या वे वाकई उस तूफान में खो गए थे या फिर उनकी कहानी कहीं और चल रही थी? सोचने वाली बात है, है ना! 

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