नमस्ते मेरे प्यारे दोस्तों! कैसे हैं आप सब? आज मैं आपके साथ एक ऐसी कहानी साझा करना चाहता हूँ जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई है, लेकिन जब आप इसे सुनेंगे, तो आपकी रूह कांप जाएगी।
क्या आपने कभी सोचा है कि हिमालय की उन बर्फीली चोटियों के पीछे, जहाँ ऑक्सीजन भी कम पड़ जाती है, वहाँ क्या छिपा है? बचपन में मैंने सुना था कि पहाड़ों में ऐसे सिद्ध पुरुष रहते हैं जो सैकड़ों सालों से जीवित हैं। मुझे तब यह सब काल्पनिक लगता था, पर जब मैंने साधु सुंदर सिंह के जीवन और उनकी तिब्बत यात्राओं के बारे में पढ़ा, तो मेरी पूरी सोच ही बदल गई।
आज हम बात करेंगे उस महान भारतीय ईसाई संत और तिब्बत के रहस्यमयी लामाओं के बीच हुए उन संवादों की, जिनके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है।
हिमालय की गोद में एक रहस्यमयी मुलाकात
जहाँ तक वास्तविकता की बात है, साधु सुंदर सिंह कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने गेरुआ वस्त्र पहने थे, लेकिन उनके दिल में मसीह की शिक्षाएं थीं। 1912 के आसपास की बात है, जब वे नंगे पैर तिब्बत की दुर्गम पहाड़ियों की ओर बढ़ रहे थे।
मैंने कहीं पढ़ा था कि तिब्बत उस समय 'निषिद्ध भूमि' (Forbidden Land) मानी जाती थी। वहाँ बाहरी लोगों का जाना मौत को बुलावा देना था। सुंदर सिंह जब वहाँ पहुँचे, तो उन्हें कई बार प्रताड़ित किया गया, लेकिन उनकी शांति देखकर वहां के बौद्ध भिक्षु और लामा भी हैरान रह गए।
एक बार की बात है, सुंदर सिंह एक गहरी गुफा के पास से गुजर रहे थे। वहाँ उनकी मुलाकात एक ऐसे लामा से हुई जिसकी उम्र का अंदाजा लगाना नामुमकिन था। कहते हैं कि वह लामा कई दशकों से केवल ध्यान लगा रहा था।
जब लामा ने पूछा—"तुम यहाँ क्या ढूँढ रहे हो?"
आईए अब जानते हैं उस बातचीत के बारे में जिसने सुंदर सिंह को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। वह लामा, जो बरसों से मौन था, सुंदर सिंह की चमक देखकर अपनी समाधि से बाहर आया।
लामा ने अपनी भारी आवाज में पूछा, "तुमने यह गेरुआ चोला क्यों पहना है? क्या तुम शांति की तलाश में हो?"
सुंदर सिंह ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "मैं शांति ढूँढने नहीं आया, मैं उस 'शांति के राजकुमार' का संदेश लेकर आया हूँ जिसे मैंने पा लिया है।"
जैसा कि मैंने अनुभव किया, इस संवाद में कोई अहंकार नहीं था। एक तरफ सदियों पुरानी तिब्बती साधना थी और दूसरी तरफ एक ऐसा अनुभव जिसने अपना सब कुछ त्याग दिया था। लामा ने सुंदर सिंह से घंटों तक आत्मा, मृत्यु और मोक्ष पर चर्चा की। लामा यह जानकर हैरान था कि एक इंसान बिना किसी तंत्र-मंत्र के, केवल प्रेम के सहारे कैसे इतना निडर हो सकता है।
मौत की सजा और वह चमत्कार
तिब्बत के एक कस्बे में सुंदर सिंह को वहां के स्थानीय लामाओं और अधिकारियों ने पकड़ लिया। उन पर आरोप था कि वे एक नए धर्म का प्रचार कर रहे हैं। उन्हें सजा के तौर पर एक सूखे कुएं में फेंक दिया गया, जिसके ऊपर का दरवाजा बंद करके ताला लगा दिया गया। वह कुआं सड़े हुए मांस और हड्डियों से भरा था।
मुझे लगता है, ऐसी स्थिति में कोई भी इंसान हार मान लेता। तीन दिन बीत गए। लेकिन चौथे दिन कुछ ऐसा हुआ जो किसी करिश्मे से कम नहीं था। रात के सन्नाटे में कुएं का ढक्कन खुला और एक रस्सी नीचे आई। सुंदर सिंह बाहर निकले, लेकिन वहां कोई नहीं था।
जब अगले दिन वे फिर से उसी जगह उपदेश देने लगे, तो वहां का मुख्य लामा दंग रह गया। उसने अपनी चाबी जांची, वह उसके पास ही थी। उस लामा ने सुंदर सिंह के पैर पकड़ लिए और पूछा, "तुम्हें उस मौत के कुएं से किसने निकाला?"
सुंदर सिंह ने बस इतना कहा, "मेरे मालिक ने।"
तिब्बती दर्शन और मसीह के प्रेम का संगम
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और उस गहरे दार्शनिक संवाद की बात करते हैं जो सुंदर सिंह और विद्वान लामाओं के बीच हुआ। तिब्बती लामाओं के पास 'निर्वाण' का ज्ञान था, जबकि सुंदर सिंह के पास 'बलिदान' की कहानी।
एक लामा ने सुंदर सिंह से पूछा, "तुम कहते हो कि दुःख से भागना नहीं चाहिए? हम तो सिखाते हैं कि संसार दुःख है और इससे पीछा छुड़ाना ही बुद्धिमत्ता है।"
सुंदर सिंह ने एक छोटा सा उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, "जैसे एक मां अपने बच्चे को बचाने के लिए खुद आग में कूद जाती है, क्या वह दुःख में है? नहीं, वह प्रेम में है। मसीह का रास्ता दुःख से भागने का नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख को उठाने का है।"
यह सुनकर वह लामा घंटों शांत रहा। मैंने देखा है कि जब दो गहरी रूहें मिलती हैं, तो शब्द कम पड़ जाते हैं और मौन ही भाषा बन जाता है।
क्या सुंदर सिंह आज भी हिमालय में हैं?
यह सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है। 1929 में, साधु सुंदर सिंह अपनी आखिरी तिब्बत यात्रा पर निकले और उसके बाद कभी वापस नहीं आए। कुछ लोग कहते हैं कि वे शहीद हो गए, तो कुछ का मानना है कि वे आज भी हिमालय की किसी गुप्त गुफा में उन लामाओं के साथ ध्यान में लीन हैं।
जहाँ तक मेरा मानना है, सुंदर सिंह जैसे लोग कभी मरते नहीं। उन्होंने तिब्बत के उन कठोर लामाओं को यह सिखाया कि धर्म केवल नियमों में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं में है।
एक छोटा सा किस्सा जो दिल छू ले
एक बार सुंदर सिंह एक बर्फीले रास्ते पर एक तिब्बती लामा के साथ चल रहे थे। रास्ता बहुत खतरनाक था। तभी उन्हें रास्ते में एक आदमी गिरा हुआ मिला जो मरणासन्न था। लामा ने कहा, "इसे यहीं छोड़ दो, नहीं तो हम भी मारे जाएंगे।"
लेकिन सुंदर सिंह ने उसे अपनी पीठ पर उठा लिया। भारी बोझ और कड़कड़ाती ठंड की वजह से उनके शरीर से पसीना निकलने लगा। उस पसीने की गर्मी से वह अधमरा आदमी भी जी उठा। जब वे सुरक्षित स्थान पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि वह लामा, जो अकेला आगे बढ़ गया था, ठंड से जम कर मर चुका था।
सुंदर सिंह ने तब कहा था, "जो अपनी जान बचाता है, वह उसे खो देता है, और जो दूसरों के लिए जान दांव पर लगाता है, वही असल में जीता है।"
दोस्तों, साधु सुंदर सिंह और तिब्बती लामाओं की ये कहानियाँ हमें सिर्फ धर्म नहीं सिखातीं, बल्कि यह बताती हैं कि इंसानियत और विश्वास की कोई सीमा नहीं होती। हिमालय की वो चोटियाँ आज भी उन अनसुने संवादों की गवाह हैं।
आपको क्या लगता है? क्या वाकई सुंदर सिंह आज भी उन पहाड़ों में कहीं छुपे हुए हैं? अपनी राय मुझे कमेंट्स में जरूर बताइएगा। मुझे आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा!

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