मेरे प्यारे दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि हम सब आज के समय में कितनी अजीब सी रेस में भाग रहे हैं? सुबह आंख खुलते ही हम अपना फोन चेक करते हैं। फिर जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस या अपने काम के लिए भागते हैं। दिन भर काम की टेंशन रहती है और रात को हम बुरी तरह थक कर बिस्तर पर गिर जाते हैं। सच कहूं तो, मैंने देखा है कि इस रोजमर्रा की भागदौड़ में हम एक चीज बहुत पीछे छोड़ आए हैं, और वह है हमारे मन की शांति।
हम आज बहुत कुछ पा रहे हैं। नई गाड़ी, अच्छा फोन, सुंदर घर और बैंक बैलेंस। लेकिन रात को आंखें बंद करते ही दिमाग में हजार बातें घूमने लगती हैं। नींद नहीं आती। दिल में एक अजीब सी बेचैनी होती है। आखिर ऐसी तरक्की का क्या फायदा जो हमारी रातों की नींद ही छीन ले?
जहां तक वास्तविकता की बात है, हमें कुछ पल रुक कर इस बारे में सोचने की जरूरत है। आज हम एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बात करेंगे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी सच्ची शांति की खोज में लगा दी। उनका नाम है साधु सुंदर सिंह। उन्होंने महलों का आराम छोड़ा, सारी सुख-सुविधाएं छोड़ीं और उस असली सुकून की तलाश में पैदल ही निकल पड़े।
अब शायद आप सोच रहे होंगे कि क्या हमें भी शांति पाने के लिए अपना घर-बार छोड़कर जंगल जाना पड़ेगा? बिल्कुल नहीं! मुझे लगता है कि हम अपने इसी बिजी रूटीन में रहकर उनके कुछ तरीके अपना सकते हैं। अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि हम उनकी बातों को आज के समय में कैसे लागू कर सकते हैं।
रोजमर्रा की उलझनों में शांति की तलाश
साधु सुंदर सिंह का मानना था कि सच्ची शांति बाहर के हालातों पर निर्भर नहीं करती। वह हमारे अंदर ही होती है। आज के समय में, जब ऑफिस में बॉस का थोड़ा सा प्रेशर आता है या घर पर किसी से कोई अनबन हो जाती है, तो हम तुरंत घबरा जाते हैं। हमारा मन बुरी तरह अशांत हो जाता है।
आईए अब जानते हैं कि साधु सुंदर सिंह इस बारे में क्या कहते थे। उनका तरीका बहुत सीधा और सरल था। वह मानते थे कि जब हम खुद से जुड़ते हैं, तभी हम उस शांति को महसूस कर सकते हैं। इसके लिए हमें दिन भर में कम से कम कुछ मिनट सिर्फ खुद के लिए निकालने होंगे। कोई फोन नहीं, कोई टीवी नहीं और कोई दूसरा इंसान नहीं। उस समय बस आप हों और आपके अपने विचार हों।
प्रकृति के साथ समय बिताना
साधु सुंदर सिंह अपना ज्यादातर समय जंगलों और पहाड़ों में बिताते थे। हिमालय की कड़कड़ाती ठंड हो या घने जंगल, उन्हें वहीं सबसे ज्यादा सुकून मिलता था। वह घंटों पेड़ों के नीचे बैठकर प्रकृति को महसूस करते थे।
अब हमारी परेशानी यह है कि हम तो कंक्रीट के जंगलों में रहते हैं। हमारे चारों तरफ बड़ी-बड़ी इमारतें और ट्रैफिक का शोर है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम प्रकृति से पूरी तरह कट जाएं। जैसा कि मैंने अनुभव किया, अगर आप सुबह सिर्फ 10 मिनट के लिए पास के किसी पार्क में जाएं और नंगे पैर घास पर चलें, तो आपके दिमाग पर इसका बहुत गहरा और अच्छा असर पड़ता है।
आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। मेरा एक दोस्त एक बड़ी कंपनी में काम करता है। वह हमेशा टेंशन में रहता था। उसने सिर दर्द और नींद न आने की दवाइयां तक खानी शुरू कर दी थीं। एक दिन मैंने उसे बस इतना कहा कि तुम हर शाम ऑफिस से लौटकर अपनी बालकनी में लगे पौधों के पास कुछ देर बैठा करो। शुरुआत में उसे यह बात बहुत अजीब लगी। लेकिन कुछ ही दिनों में उसने मुझे बताया कि मिट्टी को छूने और पौधों को अपने हाथों से पानी देने से उसकी आधी टेंशन गायब हो गई। प्रकृति में एक जादुई ताकत है जो हमें अंदर से ठीक करती है। हमें बस थोड़ा सा समय उसे देना है।
दिखावे की दुनिया से दूरी बनाना
आजकल सोशल मीडिया का जमाना है। हम सब दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी से दुखी हो जाते हैं। किसी ने नई गाड़ी ली, तो हमें अपनी पुरानी गाड़ी खराब लगने लगती है। किसी की घूमने-फिरने की फोटो देखकर हमें लगता है कि हमारी जिंदगी तो एकदम बेकार है।
मैंने देखा है कि यह दिखावा हमारी शांति का सबसे बड़ा दुश्मन है। साधु सुंदर सिंह ने बहुत कम उम्र में ही इस बात को समझ लिया था कि ये भौतिक चीजें हमें कभी सच्ची खुशी नहीं दे सकतीं। उनके पास सिर्फ एक जोड़ी कपड़े होते थे। वह एक कंबल ओढ़ते थे। फिर भी उनके चेहरे पर जो चमक और जो मुस्कान थी, वह आज के बड़े-बड़े करोड़पतियों के पास भी नहीं होती।
हमें अपनी जरूरतें और अपनी इच्छाएं, दोनों को अलग-अलग समझना होगा। हमारी जरूरतें तो बहुत थोड़ी सी हैं, पर हमारी इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं। जब हम यह दिखावे की रेस छोड़ देते हैं, तो हमारा आधा तनाव तो वैसे ही खत्म हो जाता है।
एकांत और ध्यान की आदत
जब भी हम साधु सुंदर सिंह की बात करते हैं, तो प्रार्थना और ध्यान की बात जरूर आती है। वे घंटों एकांत में बैठकर ध्यान करते थे।
आजकल हम एकांत से डरने लगे हैं। अगर हम कमरे में अकेले होते हैं, तो तुरंत अपनी जेब से फोन निकाल लेते हैं। हमें खुद के साथ वक्त बिताना आता ही नहीं है। मुझे लगता है कि यह आज के इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।
हमें दिन में कम से कम एक बार एकांत में जरूर बैठना चाहिए। अपनी आंखें बंद करें। अपनी आती-जाती सांसों पर ध्यान दें। शुरू में आपका दिमाग बहुत भागेगा। कल ऑफिस में क्या काम करना है, किसने मुझे क्या कहा था, घर का राशन लाना है... सब याद आएगा। लेकिन धीरे-धीरे आपका मन अपने आप शांत होने लगेगा। जैसा कि मैंने अनुभव किया, सुबह उठकर चाय पीते हुए सिर्फ 10 मिनट बिना किसी गैजेट के चुपचाप बैठना आपके पूरे दिन की ऊर्जा बदल देता है।
भौतिक चीजों से मोहभंग
हम इंसानों की आदत होती है कि हम चीजों को कसकर पकड़ कर बैठ जाते हैं। चाहे वह कोई पुरानी बात हो, कोई इंसान हो या कोई महंगा सामान। साधु सुंदर सिंह का जीवन 'मोहभंग' का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने अपने परिवार की अकूत दौलत छोड़ दी। वह पैदल ही मीलों का सफर तय करते थे क्योंकि वह किसी सवारी या गाड़ी के मोह में नहीं बंधना चाहते थे।
मैं आपसे यह बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ कि आप अपनी कार बेच दें या अपना घर-बार छोड़ दें। लेकिन इन चीजों के गुलाम न बनें। अगर कभी आपका इंटरनेट नहीं चल रहा या फोन की बैटरी खत्म हो गई है, तो बेचैन न हों। आप चीजों का इस्तेमाल करें, लेकिन उन्हें खुद पर हावी न होने दें। जब हम चीजों को पकड़ कर रखते हैं, तो हमारा तनाव बढ़ता है। जब हम उन्हें जाने देते हैं, तो हमारे अंदर शांति आती है।
दूसरों की मदद करने का सुकून
साधु सुंदर सिंह ने अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा में लगा दिया। उन्होंने कभी खुद के लिए किसी से कुछ नहीं मांगा। वह बीमारों की सेवा करते थे और लोगों को प्रेम का रास्ता दिखाते थे।
आईए अब जानते हैं कि इसका हमारी शांति से क्या लेना-देना है। आज के समय में विज्ञान भी यह मानता है कि जब हम किसी और की बिना किसी स्वार्थ के मदद करते हैं, तो हमारा दिमाग खुशी के हार्मोन बनाता है।
मैंने देखा है कि जब हम हमेशा "इसमें मेरा क्या फायदा है" या "मुझे क्या मिलेगा" यह सोचते हैं, तो हम अक्सर दुखी और परेशान रहते हैं। लेकिन जब आप सड़क पर किसी भूखे को खाना खिलाते हैं, या किसी बुजुर्ग की सड़क पार करने में मदद करते हैं, तो उस समय आपको जो एक अलग तरह का सुकून मिलता है, वह करोड़ों रुपये खर्च करके भी नहीं मिल सकता। यह सच्ची शांति है जो किसी दुकान पर नहीं बिकती।
माफ़ करना और आगे बढ़ना
हमारे तनाव का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि हम पुरानी बातों को कसकर पकड़ कर बैठे रहते हैं। "उसने मुझे ऐसा क्यों कहा?", "उसने मेरे साथ बुरा किया।" ये बातें हमारे दिमाग को दीमक की तरह अंदर ही अंदर खाती रहती हैं।
लोगों ने साधु सुंदर सिंह के साथ कई बार बहुत बुरा व्यवहार किया। एक बार तो कुछ लोगों ने उन्हें एक गहरे कुएं में फेंक दिया था। उस कुएं में बहुत सी सड़ी-गली लाशें पड़ी थीं। वह कई दिनों तक उस भयानक जगह पर भूखे-प्यासे रहे। लेकिन जब कुछ लोगों ने उन्हें बाहर निकाला, तो उनके मन में उन लोगों के लिए कोई गुस्सा नहीं था जिन्होंने उन्हें वहां फेंका था। उन्होंने उन सबको तुरंत माफ कर दिया।
क्या हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में यह छोटी सी बात लागू नहीं कर सकते? जैसा कि मैंने अनुभव किया, जब हम किसी को माफ कर देते हैं, तो हम उस इंसान पर कोई एहसान नहीं करते, बल्कि हम खुद पर एहसान करते हैं। हम अपने मन का एक बहुत भारी बोझ उतार कर फेंक देते हैं। जब तक हम अपने अंदर गुस्सा और नफरत पाल कर रखेंगे, हम कभी शांति नहीं पा सकेंगे।
आज में जीना सीखें
हम लोग अक्सर या तो बीते हुए कल के पछतावे में जीते हैं या फिर आने वाले कल की चिंता में। "कल क्या होगा?", "अगर मेरी नौकरी चली गई तो क्या होगा?", "अगर मेरे बच्चे अच्छे नंबर नहीं लाए तो लोग क्या कहेंगे?"
साधु सुंदर सिंह कभी कल की चिंता नहीं करते थे। वह जानते थे कि जो पल उनके हाथ में है, वही असली है। कल जो होना है, वह होकर रहेगा। अगर आप अपना आज का दिन अच्छे से जी लेते हैं, तो आपका कल अपने आप अच्छा हो जाएगा। जब भी आपका मन कल की चिंताओं में भागने लगे, तो वहीं रुक जाएं। एक लंबी सांस लें और खुद से कहें कि "अभी इस पल में सब ठीक है।"
मैंने देखा है कि जो इंसान वर्तमान में यानी आज में जीना सीख लेता है, वह दुनिया का सबसे सुखी इंसान बन जाता है।
डिजिटल दुनिया के शोर से एक ब्रेक
आजकल हमारे चारों तरफ बहुत शोर है। मैं सड़क के या ट्रैफिक वाले शोर की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उस शोर की बात कर रहा हूँ जो हमारे फोन और लैपटॉप के अंदर से आता है। हर दो मिनट में एक घंटी बजती है। कोई नया मैसेज, कोई ईमेल, कोई न्यूज़ अलर्ट।
जहां तक वास्तविकता की बात है, हमारा दिमाग इस लगातार आने वाले शोर के लिए नहीं बना है। साधु सुंदर सिंह के समय में यह सब नहीं था, इसलिए उनका दिमाग शांत रहता था। पर हम इस डिजिटल दुनिया में क्या करें?
हमें खुद के लिए कुछ कड़े नियम बनाने ही होंगे। मुझे लगता है कि दिन में कम से कम दो घंटे ऐसे होने चाहिए जब हमारा फोन हमसे बिल्कुल दूर हो। खासकर रात को सोने से पहले। जब हम सोने जाते हैं, तो हमारा दिमाग शांत होना चाहिए। लेकिन हम रील्स या वीडियो देखकर उसे और थका देते हैं।
आप आज ही एक छोटा सा प्रयोग करके देखिए। रात को सोने से एक घंटा पहले अपना फोन दूसरे कमरे में रख दें। उस एक घंटे में आप कोई अच्छी किताब पढ़ सकते हैं, या बस अपनी छत पर कुछ देर टहल सकते हैं। शुरुआत के दो-तीन दिन आपको बहुत बेचैनी होगी। आपको लगेगा कि पता नहीं फोन पर किसका मैसेज आ गया होगा। लेकिन कुछ दिनों बाद, आपको जो गहरी नींद आएगी, वह सच में कमाल की होगी। जैसा कि मैंने अनुभव किया, यह छोटी सी आदत आपकी आधी दिमागी उलझनें सुलझा सकती है।
एक सरल जीवन शैली अपनाना
साधु जी की जीवन शैली बहुत ही सरल थी। वह बहुत सीधा खाना खाते थे, सादे कपड़े पहनते थे और उनकी सोच बहुत ऊंची थी।
आज हमने अपनी जिंदगी खुद ही उलझा ली है। दस तरह के डाइट प्लान, बीस तरह के फैशन ट्रेंड्स। इन सबने हमारी जिंदगी को बहुत भारी बना दिया है। मुझे लगता है कि हमें अपनी दिनचर्या को थोड़ा सादा बनाना चाहिए। घर का बना साफ-सुथरा खाना खाएं। अपने शरीर का ध्यान रखें। समय पर सोएं और समय पर उठें। जरूरत से ज्यादा चीजें न खरीदें।
यह छोटी-छोटी आदतें हमारी दिमागी सेहत पर बहुत बड़ा असर डालती हैं। जब हम हल्का और सादा खाना खाते हैं, तो शरीर हल्का रहता है। और जब शरीर हल्का होता है, तो मन भी हल्का और शांत महसूस करता है।
मेरे प्यारे दोस्तों, यह सब बातें सुनने और पढ़ने में शायद आसान लगें और करने में थोड़ी मुश्किल। हमारा दिमाग इतने सालों की आदतों से बंधा हुआ है, इसलिए एक दिन में कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन हमें कहीं न कहीं से शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी।
आप आज से ही इनमें से कोई एक या दो बातें अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करें। हो सकता है कि आप रोज सुबह पांच मिनट ध्यान लगाना शुरू कर दें, या फिर रात को सोने से पहले फोन से दूरी बना लें। आप खुद महसूस करेंगे कि साधु सुंदर सिंह का वह शांति का रास्ता आज के इस शोर-शराबे वाले दौर में भी पूरी तरह से काम करता है। बस हमें उस रास्ते पर पहला कदम बढ़ाने की जरूरत है।

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