मेरे प्यारे दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि जब कड़ाके की ठंड में हम तीन-चार कंबल ओढ़कर भी कांप रहे होते हैं, तब हिमालय की बर्फीली चोटियों पर कोई इंसान सिर्फ एक पतली चादर में कैसे रह सकता है? आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूं जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह कहानी है साधु सुंदर सिंह की, जिन्हें 'हिमालय का प्रेरित' भी कहा जाता है।
जहां तक वास्तविकता की बात है, विज्ञान कहता है कि अगर शरीर का तापमान एक निश्चित स्तर से नीचे गिर जाए, तो इंसान की मौत हो जाती है। लेकिन सुंदर सिंह के साथ कुछ ऐसा होता था जो विज्ञान की समझ से परे था। आईए अब जानते हैं उस रहस्य के बारे में जिसने दुनिया भर के लोगों को हैरान कर दिया था।
कौन थे साधु सुंदर सिंह?
आगे बढ़ने से पहले थोड़ा उनके बारे में जान लेते हैं। सुंदर सिंह का जन्म एक अमीर सिख परिवार में हुआ था। उनके पास ऐशो-आराम की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके मन में शांति नहीं थी। बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया, जिससे वह टूट गए थे। वह सत्य की तलाश में इधर-उधर भटकते रहे।
एक दिन उन्होंने तय किया कि या तो ईश्वर उनसे बात करेंगे या वह अपनी जान दे देंगे। और फिर उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ बदल दिया। उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया, लेकिन अपना पहनावा नहीं बदला। वह एक भगवा चोला पहनते थे और नंगे पैर मीलों चलते थे। उनका मकसद सिर्फ एक था—पहाड़ों के दुर्गम रास्तों पर जाकर लोगों की मदद करना और शांति का संदेश फैलाना।
तिब्बत की वो हाड़ कंपा देने वाली ठंड
अब बात करते हैं उस असली चुनौती की, जिसका सामना उन्होंने बार-बार किया। सुंदर सिंह अक्सर तिब्बत की यात्रा पर जाते थे। सोचिए, वहां की ठंड ऐसी होती है कि बहता हुआ पानी पत्थर बन जाता है और हवाएं शरीर को चीर देती हैं।
मैंने कई बार सुना है कि लोग वहां ऑक्सीजन की कमी और ठंड से दम तोड़ देते हैं। सुंदर सिंह के पास न तो महंगे थर्मल कपड़े थे और न ही कोई हाई-टेक टेंट। वह बस एक पतली सूती चादर लपेटते और बर्फीले रास्तों पर निकल पड़ते। कई बार तो उन्हें रात गुजारने के लिए कोई गुफा तक नहीं मिलती थी, वह बस बर्फ पर बैठ जाते थे।
प्रार्थना की शक्ति या शरीर की कोई गुप्त विद्या?
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, जब हम किसी काम में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो हमें भूख-प्यास का अहसास नहीं होता। लेकिन सुंदर सिंह के मामले में यह बात एक अलग ही स्तर पर थी। जब वह प्रार्थना करने बैठते थे, तो उनके आसपास की बर्फ पिघलने लगती थी।
जी हां, आपने सही पढ़ा। कई चश्मदीदों और उनके साथ यात्रा करने वाले लोगों ने बताया है कि जब सुंदर सिंह गहरे ध्यान और प्रार्थना में होते थे, तो उनका शरीर बहुत गर्म हो जाता था। उनके शरीर से भाप निकलने लगती थी।
अब आप सोच रहे होंगे कि क्या यह 'तुम्मो' (Tummo) जैसी कोई योग विद्या थी? जैसा कि तिब्बती लामा करते हैं। लेकिन सुंदर सिंह इसे किसी योग का नाम नहीं देते थे। वह कहते थे कि यह उनके ईश्वर के साथ जुड़ाव का परिणाम है। उनके लिए प्रार्थना कोई रस्म नहीं थी, बल्कि एक ऐसी बातचीत थी जो उनके पूरे वजूद को ऊर्जा से भर देती थी।
बर्फ के पानी में स्नान और वह रहस्यमयी गर्मी
एक बार का वाकया है, जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सुंदर सिंह हिमालय के एक ऐसे ऊंचे हिस्से में थे जहां तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे था। वहां एक बर्फीला झरना बह रहा था। उन्होंने उस ठंडे पानी में जाकर स्नान किया और घंटों तक गीले कपड़ों में ही प्रार्थना करते रहे।
अगर कोई आम इंसान ऐसा करे, तो उसे तुरंत निमोनिया हो जाए या उसका शरीर नीला पड़ जाए। लेकिन सुंदर सिंह जब बाहर आए, तो वह बिल्कुल सामान्य थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक और शांति थी।
मुझे लगता है कि हमारे शरीर के अंदर एक ऐसी ऊर्जा छिपी होती है, जिसे हम आम लोग कभी पहचान ही नहीं पाते। सुंदर सिंह ने उस ऊर्जा के स्रोत को खोज लिया था। वह अक्सर कहते थे, "जब मेरा मन ईश्वर की शांति में होता है, तो बाहरी दुनिया की मुसीबतें मेरे शरीर पर असर नहीं कर पातीं।"
हिमालय के दुर्गम रास्तों पर उनके अनुभव
सुंदर सिंह की डायरी और उनके लिखे लेखों में कई ऐसी छोटी-छोटी कहानियों का जिक्र है जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। एक बार वह एक पहाड़ी रास्ते से जा रहे थे। उनके साथ एक और यात्री था। बर्फबारी इतनी तेज थी कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। रास्ते में उन्हें एक आदमी मिला जो बर्फ में दबा हुआ था और लगभग मर चुका था।
सुंदर सिंह ने उस आदमी को अपनी पीठ पर उठा लिया। उनके साथी ने मना किया और कहा, "अगर तुम इसे उठाओगे, तो तुम भी मारे जाओगे। अपनी जान बचाओ और आगे बढ़ो।" लेकिन सुंदर सिंह नहीं माने।
हैरानी की बात देखिए—उस आदमी को पीठ पर उठाकर चलने की वजह से सुंदर सिंह के शरीर में गर्मी पैदा हुई। उस गर्मी ने न सिर्फ सुंदर सिंह को बचाया, बल्कि उस अधमरे आदमी की जान भी बच गई। जबकि उनका वह साथी, जो अकेला और तेजी से आगे निकल गया था, आगे जाकर ठंड से अकड़ कर मर गया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि दूसरों की मदद करने की गर्मी ही असल में हमें जिंदा रखती है।
विज्ञान क्या कहता है इस बारे में?
अब अधिक समय न लेते हुए थोड़ा इसके वैज्ञानिक पहलू पर बात करते हैं। आज के वैज्ञानिक इसे 'ब्राउन फैट एक्टिवेशन' या 'माइंड ओवर मैटर' का नाम दे सकते हैं। हमने देखा है कि विम हॉफ (Wim Hof) जैसे लोग आज के दौर में बर्फ के टब में घंटों बिता देते हैं।
लेकिन सुंदर सिंह का मामला थोड़ा अलग था। वह कोई रिकॉर्ड बनाने के लिए ऐसा नहीं कर रहे थे। उनके लिए यह एक जीवन जीने का तरीका था। उनके शरीर की गर्मी किसी शारीरिक अभ्यास से ज्यादा उनके मानसिक और आध्यात्मिक बल का नतीजा थी।
जहां तक वास्तविकता की बात है, मानव मस्तिष्क में इतनी शक्ति है कि वह शरीर के ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम को कंट्रोल कर सके। सुंदर सिंह ने बिना किसी फॉर्मल ट्रेनिंग के, सिर्फ अपने विश्वास के दम पर इस पर काबू पा लिया था।
सुंदर सिंह की रहस्यमयी गुमशुदगी
साधु सुंदर सिंह का अंत भी उनके जीवन की तरह ही एक रहस्य बना हुआ है। 1929 में वह अपनी आखिरी तिब्बत यात्रा पर निकले। वह काफी बीमार थे, फिर भी उन्होंने रुकने से मना कर दिया। उनके दोस्तों ने उन्हें बहुत रोका, पर वह नहीं माने।
वह पहाड़ों की ओर चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे। किसी को नहीं पता कि वह कहां गए, उनकी मृत्यु कैसे हुई या उनका शरीर कहां है। कुछ लोग कहते हैं कि वह आज भी हिमालय की किसी गुप्त गुफा में ध्यान लगा रहे हैं, तो कुछ मानते हैं कि उन्होंने बर्फ के बीच ही अपनी देह त्याग दी।
मेरे प्यारे दोस्तों, सुंदर सिंह की कहानी हमें सिर्फ एक चमत्कार के बारे में नहीं बताती, बल्कि यह हमें याद दिलाती है कि इंसान की इच्छाशक्ति और उसका विश्वास पहाड़ों को भी हिला सकता है (और बर्फ को भी पिघला सकता है)।
हमने इस कहानी से क्या सीखा?
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम छोटी-छोटी समस्याओं से परेशान हो जाते हैं। हमें जरा सी ठंड लगती है तो हम शिकायत करने लगते हैं। लेकिन सुंदर सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि असली ताकत हमारे भीतर है।
अगर हम अपने मन को शांत रखना सीख जाएं और किसी नेक मकसद से जुड़ जाएं, तो हमारा शरीर भी वह कर दिखाएगा जो मुमकिन नहीं लगता।
मुझे उम्मीद है कि साधु सुंदर सिंह की यह कहानी आपको प्रेरित करेगी। अगली बार जब आपको लगे कि आप किसी बड़ी मुसीबत में हैं, तो बस एक पल के लिए हिमालय की उन बर्फीली वादियों और उस भगवा चोले वाले साधु के बारे में सोचना, जिसकी प्रार्थना ने बर्फ को भी हरा दिया था।
आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि प्रार्थना में इतनी शक्ति हो सकती है? मुझे कमेंट्स में जरूर बताइएगा। मुझे आपकी राय जानकर बहुत खुशी होगी।
तो दोस्तों, आज के लिए बस इतना ही। जल्द ही मिलेंगे एक और ऐसी ही दिलचस्प और अनसुनी कहानी के साथ। तब तक अपना ख्याल रखें और अपने अंदर की उस गर्मी को कभी कम न होने दें!

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