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साधु सुंदर सिंह के 'मसीही योग' और भारतीय ध्यान पद्धति के बीच का अंतर

 मेरे प्यारे दोस्तों, आप सभी का स्वागत है। आज हम एक बहुत ही खास और दिलचस्प विषय पर खुलकर बात करेंगे।

क्या आपने कभी मन की शांति पाने के लिए अपनी आँखें बंद करके एकांत में बैठने की कोशिश की है? मैंने देखा है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई बस पल भर के सुकून की तलाश में भाग रहा है। हम सब शांति चाहते हैं। कुछ लोग पहाड़ों की तरफ निकल जाते हैं, तो कुछ लोग अपने ही कमरे के कोने में चटाई बिछा कर ध्यान लगाते हैं। भारत तो वैसे भी योग और संतों की धरती है। यहाँ सदियों से लोग अलग-अलग तरीकों से ईश्वर को खोजने की, या यूँ कहें तो खुद को खोजने की कोशिश करते आ रहे हैं।

saadhu sundar sinh ke maseehee yog aur bhaarateey dhyaan paddhati ke beech ka antar, साधु सुंदर सिंह


आईए अब जानते हैं कि हमारे देश में पारंपरिक रूप से ध्यान कैसे किया जाता है। इसके बाद हम एक बहुत ही अनोखे और महान व्यक्ति के बारे में बात करेंगे। उनका नाम साधु सुंदर सिंह था। उन्होंने दुनिया को एक अलग ही तरह के 'मसीही योग' के बारे में बताया। अब आप शायद सोच रहे होंगे कि भला ये मसीही योग क्या चीज है? क्या इसमें भी हमें अपनी सांस रोकनी पड़ती है? क्या इसमें भी कोई खास तरह का आसन लगाना पड़ता है?

अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और सीधे अपने आज के मुद्दे की बात करते हैं।

भारतीय ध्यान पद्धति: मन को खाली करना

भारत के लोग ध्यान का मतलब अक्सर मन को पूरी तरह शांत करना मानते हैं। ऐसा मैंने देखा है। जब आप किसी ज्ञानी गुरु के पास जाते हैं, तो वह आपको क्या सिखाते हैं? वो कहते हैं कि अपने मन से सारे चलते हुए विचार बाहर निकाल दो। बस अपनी सांसों की गति पर ध्यान दो। खुद को भीतर से एकदम खाली कर लो।

भारतीय ध्यान का असली लक्ष्य 'मोक्ष' या मुक्ति पाना होता है। हमारे यहाँ के कई दर्शनशास्त्र मानते हैं कि हमारी आत्मा और वो परम शक्ति (जिसे ब्रह्मांड की ऊर्जा कहते हैं) असल में एक ही हैं। ध्यान के जरिए हमें बस इसी बात का गहरा अहसास करना होता है। इसके लिए लोग मंत्रों का लगातार जाप करते हैं। तपस्वी लोग कई-कई घंटों तक बिना हिले-डुले एक ही जगह पर बैठे रहते हैं। यह एक बहुत ही बड़ी तपस्या है। इसमें लोग बहुत ज्यादा शारीरिक और मानसिक मेहनत करते हैं। उन्हें कड़े अनुशासन में रहना पड़ता है। मुझे लगता है कि यह रास्ता बहुत ही गहरा है और इस पर चलने के लिए इंसान के भीतर बहुत पक्के इरादे की जरूरत होती है।

विषय को थोड़ा और आसानी से समझने के लिए आपको एक छोटा सा किस्सा सुनाता हूँ। मेरा एक दोस्त है। वो हर सुबह उठकर एक घंटे पूरे मन से ध्यान करता था। एक दिन मैंने उससे पूछा कि तुम आँखें बंद करके असल में क्या सोचते हो? उसने तुरंत जवाब दिया, "मैं कुछ भी न सोचने की कोशिश करता हूँ। मैं अपने मन को हर तरह के विचारों से खाली करना चाहता हूँ।" यही पारंपरिक ध्यान की सबसे बड़ी नींव है। खुद को विचारहीन और शून्य करना।

साधु सुंदर सिंह का अनोखा सफर

अब हम साधु सुंदर सिंह की बात करते हैं। वो कोई आम इंसान नहीं थे। वो पंजाब के एक बहुत ही अमीर और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे। अपनी जवानी के शुरुआती दिनों में वो मसीही धर्म (ईसाई धर्म) से बहुत चिढ़ते थे। यहाँ तक कि उन्होंने एक बार पवित्र बाइबिल को आग के हवाले भी कर दिया था। लेकिन फिर एक दिन उनके जीवन में कुछ ऐसा घटा जिसने उनकी पूरी दुनिया ही बदल दी।

कहानी कुछ ऐसी है कि वो जीवन से बहुत निराश हो चुके थे। उन्होंने तय किया कि अगर ईश्वर ने उन्हें दर्शन नहीं दिया, तो वो रेल की पटरी पर अपना सिर रखकर जान दे देंगे। उन्होंने तड़के सुबह प्रार्थना की। तभी कमरे में एक तेज रोशनी चमकी और उन्होंने साक्षात यीशु मसीह को अपने सामने खड़ा देखा। इस घटना के बाद उन्होंने अपना घर-बार हमेशा के लिए छोड़ दिया। उन्होंने भगवा कपड़े पहन लिए, ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश में साधु-संन्यासी पहनते हैं। वो नंगे पैर पूरे भारत में घूमे। वो बर्फीले हिमालय को पार करके तिब्बत तक गए ताकि लोगों को ईश्वर के प्यार के बारे में बता सकें।

जैसा कि मैंने अनुभव किया, लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर कोई मसीही है तो वो पश्चिमी देशों के कपड़े पहनेगा या विदेशी भाषा बोलेगा। लेकिन सुंदर सिंह ने पूरी दुनिया को यह दिखाया कि ईश्वर से प्यार करने के लिए आपको अपना रहन-सहन, अपने कपड़े या अपनी संस्कृति बदलने की कोई जरूरत नहीं है।

मसीही योग की असली पहचान

यहाँ हमारे लिए 'योग' शब्द को सही से समझना बहुत जरूरी है। योग का असल अर्थ क्या होता है? इसका अर्थ है 'जुड़ना' या 'मिलन'। जब साधु सुंदर सिंह 'मसीही योग' के बारे में बात करते थे, तो उनका इशारा किसी भी तरह की शारीरिक कसरत या मुश्किल आसन की तरफ बिलकुल नहीं था।

उनका मतलब था यीशु मसीह की आत्मा के साथ अपनी आत्मा का जुड़ना। उनके लिए ध्यान कोई ऐसी शारीरिक तकनीक नहीं थी जहाँ आपको अपनी सांसों को किसी खास गिनती के साथ अंदर-बाहर करना है। उनके लिए ध्यान का सीधा सा मतलब था अपने सबसे प्यारे और करीब दोस्त के साथ एकांत में बैठकर बातें करना।

ध्यान का असली लक्ष्य: शून्य होना या रिश्ता बनाना?

यहीं आकर इन दोनों पद्धतियों का सबसे बड़ा अंतर खुलकर सामने आता है। इसे जरा ध्यान से समझिएगा।

भारतीय ध्यान पद्धति में हम खुद को 'शून्य' या खाली करने की पूरी कोशिश करते हैं। हम उस परम शक्ति में ऐसे मिल जाना चाहते हैं जैसे पानी की एक छोटी सी बूंद बड़े समुद्र में गिरकर अपना खुद का वजूद हमेशा के लिए खो देती है।

लेकिन जहां तक वास्तविकता की बात है, साधु सुंदर सिंह का मसीही योग इस विचार से बिलकुल अलग दिशा में जाता है। सुंदर सिंह पानी की बूंद और समुद्र वाला उदाहरण बहुत इस्तेमाल करते थे। पर वो कहते थे कि मैं पानी की बूंद बनकर समुद्र में अपनी पहचान खोना नहीं चाहता। मैं तो समुद्र का मीठा पानी पीना चाहता हूँ!

इसके लिए वो स्पंज का एक बहुत ही सुंदर उदाहरण देते थे। वो कहते थे कि जब आप एक स्पंज को पानी में डालते हैं, तो पानी स्पंज के अंदर चला जाता है और स्पंज पानी के अंदर रहता है। लेकिन स्पंज पानी नहीं बन जाता। उसकी अपनी एक अलग पहचान रहती है। ठीक इसी तरह, उनका मानना था कि ध्यान का मतलब खुद को खत्म करना नहीं है। बल्कि इसका मतलब है ईश्वर के साथ एक ऐसा गहरा रिश्ता बनाना जहाँ आप अपनी पहचान नहीं खोते। आप इंसान ही रहते हैं, और ईश्वर ईश्वर रहता है। बस आप दोनों के बीच एक बहुत ही गहरा प्यार पनपता है। जब वो ध्यान में बैठते थे, तो वो अपना दिमाग खाली नहीं करते थे, बल्कि वो अपने दिमाग और दिल को यीशु के प्यार से ऊपर तक भर लेते थे।

इंसान की कोशिश बनाम शांति का उपहार

इन दोनों बातों में एक और बहुत बड़ा फर्क है। मैंने देखा है कि पारंपरिक ध्यान में इंसान को बहुत ज्यादा जोर लगाना पड़ता है। आपको अपनी आँखों, कानों और अपने विचारों को जबरदस्ती काबू में करना पड़ता है। ये पूरी तरह से आपके अपने 'प्रयास' या मेहनत पर टिका है। आप जितनी कड़ी मेहनत करेंगे, आप ध्यान में उतने ही आगे बढ़ेंगे।

लेकिन मसीही योग में यह बात लागू नहीं होती। सुंदर सिंह लोगों को समझाते थे कि सच्ची शांति हम अपनी मेहनत से कभी नहीं कमा सकते। यह शांति तो ईश्वर का दिया हुआ एक मुफ्त उपहार (Gift) है। हमें बस अपना दिल खोलकर इसे ग्रहण करना है। जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ की गोद में बिना किसी डर के शांति से सो जाता है, ठीक वैसे ही वो ध्यान के समय ईश्वर की गोद में बैठकर असीम शांति महसूस करते थे।

उनके जीवन की एक बहुत ही रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है। एक बार वो हिमालय की बर्फीली और खतरनाक पहाड़ियों के बीच यात्रा कर रहे थे। ठंड जानलेवा थी। उनके पास न तो कोई गर्म कपड़े थे और न ही खाने के लिए कुछ बचा था। वो एक छोटी सी गुफा में बैठ गए। बाहर बहुत भयंकर बर्फीला तूफान चल रहा था। कोई आम इंसान होता तो शायद ठंड और डर के मारे वहीं दम तोड़ देता। लेकिन सुंदर सिंह ने आँखें बंद कीं और प्रार्थना करने लगे। वो यीशु के ध्यान में इतने गहरे उतर गए कि उनके शरीर ने ठंड महसूस करना ही बंद कर दिया। उन्हें ऐसा लगा जैसे यीशु साक्षात उनके पास बैठे हैं और उन्हें अपनेपन की गर्माहट दे रहे हैं। उनके चेहरे पर एक ऐसी अनोखी शांति थी जिसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता।

उन्होंने यह शांति किसी सांस रोकने वाली तकनीक से हासिल नहीं की थी। यह शांति उन्हें ईश्वर के साथ बने उस गहरे 'संबंध' से मिली थी।

मौन में ईश्वर की आवाज सुनना

हम अपने पारंपरिक ध्यान में अक्सर ब्रह्मांड की किसी खास ध्वनि (जैसे 'ओम' की गूंज) को अपने भीतर सुनने की कोशिश करते हैं। या फिर हम अपने ही अंदर पैदा होने वाली शांति की लहर को महसूस करते हैं।

परन्तु मसीही योग में, साधु सुंदर सिंह ध्यान के दौरान एक जीवित ईश्वर की साफ आवाज सुनने का इंतजार करते थे। उनके लिए ध्यान एक दो-तरफा बातचीत थी। शुरुआत में वो प्रार्थना करते समय ईश्वर से अपने दिल की सारी बातें कहते थे। अपनी परेशानियां बताते थे। फिर वो एकदम चुपचाप बैठ जाते थे। बिलकुल शांत। वो ऐसा इसलिए करते थे ताकि वो पलटकर ईश्वर का जवाब सुन सकें।

वो दिल से मानते थे कि ईश्वर आज भी इंसानों से बात करता है। बस हमें उसकी मीठी आवाज सुनने के लिए अपने अंदर चल रहे दुनियादारी के शोर को शांत करना होता है। यह शोर हमारे मन के अनगिनत विचारों का शोर है, कल की चिंताओं का शोर है। जब वो पूरी तरह शांत होकर ध्यान में बैठते थे, तो उन्हें सचमुच ऐसा लगता था कि यीशु उन्हें सही रास्ता दिखा रहे हैं और उनसे बातें कर रहे हैं।

दुख और तकलीफों में ध्यान का सहारा

आप और हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि यह जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती। दुख, दर्द और तकलीफें तो हर इंसान के दरवाजे पर आती ही हैं।

भारतीय दर्शन में ज्ञानी लोग अक्सर कहते हैं कि यह दुनिया एक 'माया' (छलावा) है। और हमारे हर दुख की असली जड़ हमारी अपनी इच्छाएं हैं। जब हम ध्यान के जरिए अपनी इन सभी इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं, तो हमारा दुख भी अपने आप जड़ से खत्म हो जाता है।

लेकिन मसीही योग इस बात को एक अलग ही नजरिए से देखता है। साधु सुंदर सिंह ने अपनी जिंदगी में अनगिनत दुख सहे। विरोधियों ने उन्हें कई बार जेल में डाल दिया। लोगों ने उन्हें बेरहमी से मारा-पीटा। तिब्बत के लोगों ने तो उन्हें एक बार एक सूखे और गहरे कुएँ में सड़ी-गली लाशों के बीच मरने के लिए फेंक दिया था।

क्या ऐसे भयानक हालातों में भी वो ध्यान करते थे? जी हाँ! वो बिलकुल करते थे।

परन्तु उनका ध्यान उन्हें इस दुनिया की कड़वी सच्चाई या उस दर्द से दूर नहीं भगाता था। बल्कि, वो उस भयानक दुख के ठीक बीच में ईश्वर की मौजूदगी को अपने साथ महसूस करते थे। वो जानते थे कि यीशु मसीह ने खुद क्रूस पर भयानक दुख सहा था। इसलिए जब वो ध्यान में यीशु के दर्द के साथ जुड़ते थे, तो उनका अपना दुख भी एक अजीब सी खुशी में बदल जाता था। वो अक्सर कहते थे कि दुख एक कड़वी दवा की तरह काम करता है जो हमारी बीमार आत्मा को पूरी तरह से ठीक कर देता है।

खुली आँखों से ईश्वर को देखना

अक्सर हम अपने मन में यह बात बैठा लेते हैं कि सही मायने में ध्यान करने के लिए हमें सब कुछ छोड़कर किसी दूर घने जंगल में जाना पड़ेगा। ऐसा मैंने कई लोगों को आपस में चर्चा करते हुए सुना है। पारंपरिक योग के कई जानकार भी ऐसा ही कहते हैं कि दुनियादारी से नाता तोड़े बिना सच्चा ज्ञान नहीं मिलता।

मगर मसीही योग के अनुसार, साधु सुंदर सिंह हमेशा यही सिखाते थे कि ईश्वर से जुड़ने के लिए आपको अपने परिवार या दुनिया से भागने की कतई जरूरत नहीं है। वो खुद एक भगवाधारी साधु थे, लेकिन वो हमेशा आम लोगों के बीच रहते थे। वो बीमारों की सेवा करते थे। वो कहते थे कि एक किसान खेत में हल चलाते हुए भी ध्यान कर सकता है। एक माँ अपनी रसोई में परिवार के लिए खाना बनाते हुए भी मसीह के साथ जुड़ी रह सकती है।

साधु सुंदर सिंह का ध्यान सिर्फ बंद आँखों और किसी अंधेरे कमरे तक सीमित नहीं था। वो खुली आँखों से भी ईश्वर को हर जगह, हर चीज में देखते थे। जब वो रास्ते में खिले किसी सुंदर फूल को देखते, तो वो उसमें ईश्वर की महान कारीगरी देखते थे। जब वो किसी गरीब और भूखे इंसान को देखते, तो वो उस इंसान की आँखों में मसीह का चेहरा देखते थे। ईश्वर की बनाई हुई हर चीज में ईश्वर को खोजना भी तो एक बहुत ही ऊंचा ध्यान है। है ना?

भावनाओं और प्रेम की जगह

एक और बहुत खास बात जो मुझे लगता है कि इन दोनों रास्तों में एकदम अलग है, वो है इंसानी भावनाओं की जगह।

कुछ ध्यान पद्धतियों में गुरु लोग सिखाते हैं कि हमें अपनी सभी भावनाओं को पूरी तरह से परे रखना चाहिए। चाहे वो बहुत ज्यादा खुशी हो या बहुत गहरा दुख, आपको हर चीज से अलग (detached) होना पड़ता है। आपको बस एक दूर खड़े होकर देखने वाला (observer) बनना होता है, जिस पर किसी बात का असर न हो।

लेकिन मसीही योग तो पूरी तरह से प्यार और भावनाओं से लबालब भरा हुआ है। साधु सुंदर सिंह का ध्यान कभी भी सूखा या बिना भावनाओं वाला नहीं था। वो ईश्वर के प्यार को याद करके बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोते थे। वो ईश्वर की मौजूदगी महसूस करके खुशी से नाच उठते थे। उनके ध्यान के अंदर एक तेज आग जलती थी। ईश्वर के प्रति सच्चे प्यार की आग। वो ईश्वर को कोई निर्जीव ब्रह्मांडीय ऊर्जा नहीं मानते थे, बल्कि एक बहुत ही प्यार करने वाला पिता मानते थे। और जब आप एक पिता के साथ रिश्ते में होते हैं, तो वहां प्यार, आंसू, खुशी और भावनाएं तो छलकेंगी ही!

मेरे प्यारे दोस्तों, ये थी वो कुछ बहुत ही खास बातें जो भारतीय ध्यान पद्धति और साधु सुंदर सिंह के अनोखे मसीही योग को एक-दूसरे से काफी अलग बनाती हैं।

अगर हम गौर से देखें तो दोनों ही रास्तों पर चलने वाले लोग इस दुनिया में सच्ची शांति और ईश्वर की तलाश कर रहे हैं। दोनों ही रास्तों पर चलने के लिए इंसान को पूरी ईमानदारी और पक्की लगन की जरूरत पड़ती है।

एक रास्ता हमें यह सिखाता है कि कैसे खुद के वजूद को मिटाकर, शून्य होकर ब्रह्मांड की उस महान ऊर्जा में विलीन हो जाना है। यह रास्ता हमें अपने चंचल मन पर लगाम लगाना सिखाता है।

वहीं दूसरा रास्ता, यानी साधु सुंदर सिंह का मसीही योग, हमें यह बताता है कि कैसे खुद को शून्य करने के बजाय ईश्वर के अपार प्रेम से ऊपर तक भर लेना है। यह रास्ता किसी सांस लेने के नियम या तकनीक के बारे में कम बात करता है, और एक बहुत ही खूबसूरत, जीवित रिश्ते के बारे में ज्यादा बात करता है। यह रास्ता हमें यह भरोसा दिलाता है कि ईश्वर किसी दूर आसमान में नहीं बैठा है, बल्कि वह हमारे ही दिलों में एक बहुत ही प्यारे दोस्त की तरह हमेशा रहने के लिए बेताब है।

मैंने इन विषयों पर जो कुछ भी पढ़ा और अपने जीवन में समझा, उससे मुझे एक बात तो शीशे की तरह साफ समझ आ गई। इंसान के अंदर ईश्वर तक पहुँचने की भूख बहुत गहरी है। हम चाहे आँखें बंद करके जमीन पर बैठकर मंत्र पढ़ें, या घुटनों के बल बैठकर आसमान की तरफ देखकर अपने दिल की हर छोटी-बड़ी बात कहें... सबसे अहम बात यह है कि हमारे दिल में कोई कपट नहीं होना चाहिए, हमारा दिल आईने की तरह साफ होना चाहिए।

आप इस पूरे विषय के बारे में क्या सोचते हैं? जब भी आप अगली बार एकांत में बैठें, तो एक बार इस नजरिए से दोनों के बारे में जरूर विचार कीजिएगा।

आज के इस ब्लॉग में बस इतना ही। जल्द ही फिर मिलेंगे किसी नए और दिलचस्प विषय के साथ! अपना ख्याल रखिएगा।

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