नमस्ते मेरे प्यारे दोस्तों!
आज मैं आपसे एक ऐसी शख्सियत के बारे में बात करना चाहता हूँ, जिनकी कहानी सुनकर शायद आपकी आँखों में भी आँसू आ जाएँ और दिल में एक अजीब सा सुकून भर जाए। हम बात कर रहे हैं साधु सुंदर सिंह की। आपने उनके बारे में सुना ही होगा—लुधियाना का वो रईस सिख लड़का, जो बाद में मसीह की राह पर निकल पड़ा।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक अमीर परिवार का इकलौता लाडला बेटा, जिसके पास दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं थीं, वह 'ईसाई साधु' कैसे बन गया? अक्सर लोग उनके मसीही बनने के चमत्कार की बात करते हैं, पर जहाँ तक वास्तविकता की बात है, इस पूरी कहानी की नींव उनकी माँ ने रखी थी।
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि एक माँ की ममता और उसकी दी हुई सीख ने कैसे एक 'साधु' को जन्म दिया।
साधु सुंदर सिंह का बचपन और उनकी माँ का साया
सुंदर सिंह का जन्म लुधियाना के पास रामपुर गाँव में एक बहुत ही प्रभावशाली और अमीर जमींदार परिवार में हुआ था। घर में नौकर-चाकर थे, ऐशो-आराम की कोई कमी नहीं थी। लेकिन मैंने देखा है कि बड़े घरों के बच्चे अक्सर बिगड़ जाते हैं, पर सुंदर के साथ ऐसा नहीं था। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी माँ थीं।
उनकी माँ एक बहुत ही धार्मिक और संस्कारी महिला थीं। हालाँकि वह एक हिंदू परिवार से आई थीं और बाद में सिख परिवार में ब्याही गईं, लेकिन उनके मन में ईश्वर के प्रति जो प्रेम था, वह किसी धर्म की सीमा में नहीं बंधा था। वह सुंदर को बचपन से ही धार्मिक ग्रंथों की कहानियाँ सुनाया करती थीं।
माँ की वो छोटी सी ख्वाहिश
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, हर माँ का अपने बच्चे के लिए एक सपना होता है। सुंदर की माँ का सपना डॉक्टर या इंजीनियर बनाना नहीं था। वह अक्सर सुंदर से कहती थीं, "बेटा, दुनिया की चकाचौंध में मत खोना। तुम्हें एक सच्चा 'साधु' बनना है।"
सोचिए, आज के समय में कौन सी माँ अपने बेटे को साधु बनने के लिए कहेगी? सब चाहते हैं कि बेटा खूब पैसे कमाए। लेकिन उनकी माँ चाहती थीं कि उनका बेटा ईश्वर की खोज करे। वह उन्हें रोज़ सुबह जल्दी जगाती थीं, उन्हें नहलाती थीं और फिर पवित्र ग्रंथों का पाठ करने के लिए कहती थीं। मुझे लगता है, सुंदर के मन में जो शांति की तलाश शुरू हुई, उसका बीज उसी समय बो दिया गया था।
शांति की तलाश और माँ की सीख
सुंदर अपनी माँ के बहुत करीब थे। वह अपनी माँ को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानते थे। उनकी माँ उन्हें अक्सर अपने साथ मंदिर और गुरुद्वारे ले जाती थीं। वह उनसे कहती थीं कि असली शांति बाहर की चीज़ों में नहीं, बल्कि मन के अंदर है।
एक छोटा सा किस्सा मुझे याद आता है। सुंदर जब बहुत छोटे थे, तो उनकी माँ उन्हें संतों और ऋषियों के पास ले जाया करती थीं ताकि वह उनसे कुछ सीख सकें। उन्होंने सुंदर को सिखाया कि दुनिया की दौलत तो आज है और कल नहीं, लेकिन जो रूहानी दौलत है, वह हमेशा साथ रहती है। यही वजह थी कि सुंदर के मन में बचपन से ही यह बात बैठ गई थी कि उन्हें कुछ बड़ा और रूहानी हासिल करना है।
जब माँ का साथ छूट गया
कहते हैं कि इंसान की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब उसका सबसे प्यारा इंसान उससे दूर चला जाता है। जब सुंदर सिर्फ चौदह साल के थे, तब उनकी माँ का देहांत हो गया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख था। सुंदर एकदम टूट गए थे। जिस माँ ने उन्हें ईश्वर का रास्ता दिखाया था, अब वही उनके साथ नहीं थी।
जहाँ तक मेरा मानना है, माँ की मौत ने सुंदर के अंदर एक खालीपन पैदा कर दिया। वह इतने परेशान रहने लगे कि उन्हें कहीं शांति नहीं मिलती थी। उन्होंने भगवद गीता, कुरान और अन्य धर्मग्रंथ पढ़े, लेकिन माँ की कमी और मन की बेचैनी कम नहीं हुई।
माँ की याद और बाइबल से नफरत
शायद आपको जानकर हैरानी हो, लेकिन माँ की मृत्यु के बाद सुंदर ईसाई धर्म से नफरत करने लगे थे। उन्हें लगता था कि यह विदेशी धर्म है। उन्होंने अपने स्कूल में बाइबल तक जला दी थी। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि वह यह सब क्यों कर रहे थे? क्योंकि वह सच की तलाश में थे और उन्हें लग रहा था कि वह भटक गए हैं।
लेकिन उनकी माँ की वह बात उनके कानों में गूँजती रहती थी—"बेटा, साधु बनना।" वह शांति जो उनकी माँ उनके चेहरे पर देखना चाहती थी, वह उन्हें मिल नहीं रही थी। इसी तड़प में उन्होंने ठान लिया कि या तो वह ईश्वर को पा लेंगे या अपनी जान दे देंगे।
वो जादुई रात और माँ का सपना पूरा होना
दिसंबर की वो कड़ाके की ठंड वाली रात थी। सुंदर ने तय किया कि अगर सुबह पांच बजे तक ईश्वर उन्हें दर्शन नहीं देते, तो वह ट्रेन के नीचे आकर जान दे देंगे। और फिर जो हुआ, उसने इतिहास बदल दिया। उन्हें ईसा मसीह का दर्शन हुआ।
उस पल सुंदर को समझ आया कि जिस 'शांति' की बात उनकी माँ करती थीं, वह उन्हें मिल गई है। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी माँ की उस बात को याद रखा कि उन्हें एक 'साधु' बनना है। इसलिए उन्होंने पादरी के काले कपड़े पहनने के बजाय एक संन्यासी का भगवा चोला पहना।
भारतीय संस्कृति और साधु का रूप
सुंदर सिंह ने जब मसीह को अपनाया, तो उन्होंने यह महसूस किया कि उन्हें अपनी माँ की सिखाई हुई भारतीय संस्कृति को नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने देखा कि लोग ईसाई धर्म को विदेशी समझते हैं। इसलिए उन्होंने एक साधु के रूप में सुसमाचार सुनाना शुरू किया।
अगर उनकी माँ ने उन्हें बचपन में साधु बनने की प्रेरणा न दी होती, तो शायद सुंदर सिंह भी एक आम ईसाई बन कर रह जाते। लेकिन माँ की उस एक बात ने उन्हें 'साधु सुंदर सिंह' बना दिया। वह नंगे पैर हिमालय की पहाड़ियों में जाते थे, कड़ाके की ठंड सहते थे, लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा वही मुस्कान रहती थी जो उनकी माँ देखना चाहती थीं।
क्या माँ की भूमिका सबसे बड़ी थी?
आईए अब जानते हैं कि क्या वाकई सुंदर सिंह के आध्यात्मिक जीवन का पूरा श्रेय उनकी माँ को जाता है? मेरा जवाब है—हाँ, बिल्कुल।
देखिये, मसीह का मिलना एक दैवीय घटना थी, लेकिन उस घटना के लिए जो 'भूख' चाहिए थी, वह उनकी माँ ने पैदा की थी। अगर माँ ने उन्हें धर्म और अध्यात्म की तरफ न मोड़ा होता, तो शायद सुंदर एक ज़मींदार बनकर अपनी ज़िंदगी गुज़ार देते।
मैंने देखा है कि हम जो कुछ भी आज हैं, उसमें हमारे बचपन के संस्कारों का बहुत बड़ा हाथ होता है। सुंदर सिंह की माँ ने उन्हें केवल पूजा-पाठ नहीं सिखाया, बल्कि उन्हें एक ऐसा चरित्र दिया जो सत्य के लिए कुछ भी कुर्बान करने को तैयार था। जब उनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया, तब भी वह डगमगाए नहीं। क्यों? क्योंकि उनकी माँ की दी हुई हिम्मत उनके साथ थी।
माँ के बिना अधूरा था सुंदर का सफर
सुंदर सिंह अक्सर कहते थे, "मैंने अपनी माँ से ईश्वर के बारे में बहुत कुछ सीखा।" वह अपनी माँ को अपना पहला गुरु मानते थे। यहाँ तक कि मसीह को पाने के बाद भी वह अपनी माँ की यादों को बहुत सम्मान के साथ सहेज कर रखते थे।
कल्पना कीजिए, एक चौदह साल का बच्चा अपनी माँ को खो देता है, उसका पूरा परिवार उसके खिलाफ हो जाता है, उसे ज़हर देने की कोशिश की जाती है, उसे घर से बेघर कर दिया जाता है—इतने दुखों के बाद भी वह इंसान कैसे खड़ा रहा? मुझे लगता है, वह अपनी माँ का वही सपना था जो उन्हें गिरने नहीं देता था। उन्हें पता था कि अगर आज वह पीछे हट गए, तो उनकी माँ की वो सीख हार जाएगी।
आज के समय में इस कहानी का सबक
मेरे प्यारे दोस्तों, साधु सुंदर सिंह की कहानी सिर्फ एक धर्म बदलने की कहानी नहीं है। यह एक माँ की परवरिश की कहानी है। यह हमें बताती है कि एक माँ चाहे तो अपने बच्चे को किस ऊँचाई तक ले जा सकती है।
आज हम सब भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हैं। हमें लगता है कि बच्चों को अच्छे स्कूल में डाल देना और उन्हें महँगे गैजेट्स दिला देना ही हमारी ज़िम्मेदारी है। लेकिन सुंदर की माँ ने सिखाया कि सबसे ज़रूरी है बच्चे के भीतर एक 'खोज' पैदा करना। सच्चाई की खोज, शांति की खोज।
साधु सुंदर सिंह का जीवन इस बात का गवाह है कि एक माँ की दुआ और उसकी दी हुई शिक्षा कभी खाली नहीं जाती। भले ही वह उनकी सफलता देखने के लिए इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन उनका बेटा दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया।
तो दोस्तों, साधु सुंदर सिंह और उनकी माँ का यह रिश्ता हमें सिखाता है कि अध्यात्म कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो अचानक कहीं से आ जाती है। यह उन छोटे-छोटे संस्कारों का परिणाम है जो हमें बचपन में मिलते हैं। सुंदर सिंह ने तो दुनिया छोड़ दी, हिमालय की बर्फ में कहीं ओझल हो गए, लेकिन उनकी माँ का दिया हुआ वो 'साधु' का नाम आज भी अमर है।
उम्मीद है आपको यह कहानी पसंद आई होगी और इससे कुछ न कुछ सीखने को ज़रूर मिला होगा। आखिर में बस यही कहूँगा—अपनी जड़ों को कभी मत भूलिए, क्योंकि वहीं से हमें आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है।

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