मेरे प्यारे दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ जिसे सुनकर शायद आपकी रूह कांप जाए या फिर आपको सुकून मिले। यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन यह हकीकत है। हम बात कर रहे हैं साधु सुंदर सिंह की। एक ऐसा नाम, जिसने लुधियाना के एक आलीशान बंगले की सुख-सुविधाओं को लात मारकर कांटों भरा रास्ता चुना।
सोचिए, एक लड़का जिसके पास दौलत की कोई कमी नहीं थी, जिसके पिता पंजाब के सबसे रईस लोगों में गिने जाते थे, आखिर उसे ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि वह आधी रात को खुदकुशी करने की ठान बैठा?
नफरत की आग और जलती हुई बाइबिल
साधु सुंदर सिंह का जन्म एक कट्टर सिख परिवार में हुआ था। उनकी माँ बहुत धार्मिक महिला थीं और वह चाहती थीं कि सुंदर एक 'पवित्र साधु' बनें। लेकिन सुंदर के मन में ईसाइयत के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ नफरत थी। वह ईसाई मिशनरियों को देखना तक पसंद नहीं करते थे।
जहाँ तक वास्तविकता की बात है, उनकी यह नफरत इस कदर बढ़ गई थी कि एक दिन उन्होंने अपने स्कूल के साथियों के सामने बाइबिल के पन्ने फाड़े और उन्हें आग के हवाले कर दिया। उनके पिता ने उन्हें समझाया भी कि बेटा, यह गलत है, लेकिन सुंदर का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्हें लगता था कि यह धर्म उनके अपने धर्म और संस्कृति के लिए खतरा है।
लेकिन दोस्तों, मन की शांति पैसों से नहीं खरीदी जा सकती। बाइबिल जलाने के बाद भी सुंदर को चैन नहीं मिला। उनके दिल में एक अजीब सी बेचैनी घर कर गई थी। उन्हें लगने लगा कि अगर ईश्वर सच में है, तो वह मुझसे बात क्यों नहीं करता?
वह खौफनाक फैसला: मौत या परमात्मा
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं उस रात की तरफ, जिसने इतिहास बदल दिया। दिसंबर का महीना था, कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। सुंदर सिंह के मन में सवालों का तूफान था। उन्होंने तय किया कि या तो वह आज सच को जान लेंगे या फिर अपनी जान दे देंगे।
उन्होंने प्रतिज्ञा की, "अगर सुबह 5 बजे तक ईश्वर ने मुझे रास्ता नहीं दिखाया, तो मैं लुधियाना-दिल्ली एक्सप्रेस के नीचे लेटकर अपनी जान दे दूँगा।"
मुझे लगता है, इंसान जब हार की आखिरी सीढ़ी पर होता है, तभी वह दिल से पुकारता है। सुंदर ने ठंडे पानी से स्नान किया और अपने कमरे में घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना करने लगे। वह बार-बार कह रहे थे, "हे ईश्वर, यदि तू है तो मुझे अपना रास्ता दिखा।"
3 बजे सुबह का वह विजन: जब सब बदल गया
सुबह के ठीक 3 बज रहे थे। अचानक कमरे में एक रौशनी फैली। सुंदर को लगा कि शायद कमरे में आग लग गई है। उन्होंने दरवाजा खोलकर देखा, लेकिन बाहर अंधेरा था। जब वह वापस मुड़े, तो उन्होंने देखा कि कमरे के बीचों-बीच एक चमकदार बादल जैसा कुछ है और उस रौशनी में एक चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।
वह चेहरा कोई साधारण इंसान नहीं था। सुंदर सिंह ने देखा कि उस शख्स के हाथों और पैरों में घाव के निशान थे। वह कोई और नहीं, बल्कि वही यीशु मसीह थे जिनकी किताब सुंदर ने कुछ दिन पहले जलाई थी।
जैसा कि मैंने अनुभव किया है और कहानियों में पढ़ा है, वह पल किसी के भी होश उड़ा सकता है। यीशु ने उनसे बड़ी शांति से कहा, "तुम मुझे कब तक सताओगे? याद करो, मैंने तुम्हारे लिए अपनी जान दी।"
सुंदर सिंह सन्न रह गए। जिस शख्स से वह नफरत करते थे, वही उनके सामने प्यार और करुणा का समंदर बनकर खड़ा था। उसी पल, सुंदर की नफरत पिघल कर आंसू बनकर बहने लगी। उन्होंने वहीं अपना सिर झुकाया और यीशु को अपना लिया।
घर से निकाले जाने का दर्द और वह जहर का प्याला
आईए अब जानते हैं उस संघर्ष के बारे में जो इस विजन के बाद शुरू हुआ। जब सुंदर ने अपने परिवार को बताया कि वह ईसाई बन गए हैं, तो उनके घर में भूचाल आ गया। उनके पिता शेर सिंह ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की। उन्हें धन-दौलत और ऐशो-आराम का लालच दिया गया, लेकिन सुंदर पर तो अब किसी और ही धुन का सवार था।
अंत में, उनके परिवार ने उन्हें एक 'अछूत' घोषित कर दिया। उनके अपने ही परिवार ने उन्हें खाने में जहर मिलाकर दे दिया। उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया। वह रात उन्होंने एक पेड़ के नीचे बिताई, शरीर जहर से गल रहा था, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी।
मैंने देखा है कि जब इंसान को रूहानी सुकून मिल जाता है, तो शरीर का दर्द छोटा पड़ जाता है। सुंदर किसी तरह अस्पताल पहुंचे और चमत्कारिक रूप से बच गए। इसके बाद उन्होंने पंजाब के उस अमीर खानदान के रेशमी कपड़े उतार दिए और केसरिया चोला पहन लिया। वह 'साधु सुंदर सिंह' बन गए।
केसरिया चोला और नंगे पैर: हिमालय की यात्राएं
सुंदर सिंह का मानना था कि भारत के लोगों को अगर मसीह का संदेश देना है, तो उन्हीं की भाषा और उन्हीं के रंग में रंगना होगा। उन्होंने एक साधु का भेष धारण किया और नंगे पैर हिमालय की पहाड़ियों और तिब्बत की ओर निकल पड़े।
तिब्बत जाना उन दिनों मौत को दावत देने जैसा था। वहाँ के लोग बाहरी धर्म के प्रचारकों को बर्दाश्त नहीं करते थे। सुंदर को कई बार जेल में डाला गया, उन्हें भूखा रखा गया, यहाँ तक कि एक बार उन्हें लाशों से भरे एक गहरे सूखे कुएं में फेंक दिया गया था। उस कुएं का ढक्कन बाहर से बंद कर दिया गया था।
कल्पना कीजिए, चारों तरफ सड़ी हुई लाशें और बदबू, लेकिन सुंदर वहाँ भी प्रार्थना कर रहे थे। तीन दिन बाद, किसी अनजान शख्स ने कुएं का ढक्कन खोला और रस्सी फेंककर उन्हें बाहर निकाला। जब वह बाहर आए, तो वहाँ कोई नहीं था। सुंदर का मानना था कि वह खुद ईश्वर का दूत था।
साधु सुंदर सिंह के जीवन से हमें क्या मिलता है?
मेरे प्यारे दोस्तों, सुंदर सिंह की कहानी सिर्फ़ धर्म बदलने की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस 'सच्चाई' की खोज की, जिसके लिए इंसान अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। उन्होंने सिखाया कि धर्म कोई दीवारों में कैद चीज नहीं है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत अनुभव है।
आज के समय में जहाँ हम छोटी-छोटी परेशानियों में टूट जाते हैं, सुंदर सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि अगर विश्वास पक्का हो, तो आप मौत के मुंह से भी मुस्कुराते हुए वापस आ सकते हैं। लुधियाना का वह अमीर लड़का चाहता तो करोड़ों की प्रॉपर्टी का वारिस बनकर अपनी जिंदगी आराम से काट सकता था, लेकिन उसने उन रास्तों को चुना जहाँ सिर्फ़ पत्थर और मुश्किलें थीं।
आखिरी सफर: जब वह बादलों में कहीं खो गए
साधु सुंदर सिंह का अंत भी उनके जीवन की तरह ही रहस्यमयी रहा। 1929 में, वह एक बार फिर तिब्बत की यात्रा पर निकले। उनकी सेहत खराब थी, दोस्तों ने उन्हें रोका भी, पर उन्होंने कहा कि "मुझे मेरे मालिक का काम करना है।"
उस यात्रा के बाद वह कभी वापस नहीं आए। वह पहाड़ों की बर्फ में कहाँ खो गए, किसी को नहीं पता। बहुत तलाश की गई, लेकिन उनकी कोई खबर नहीं मिली। लोगों का कहना है कि वह शायद वहीं कहीं प्रार्थना करते हुए ईश्वर में विलीन हो गए।
तो दोस्तों, यह था एक ऐसा सफर जो नफरत से शुरू हुआ और बेपनाह मोहब्बत पर खत्म हुआ। 3 बजे सुबह का वह विजन सिर्फ सुंदर सिंह के लिए नहीं था, वह हर उस इंसान के लिए एक मिसाल है जो अंधेरे में रोशनी की तलाश कर रहा है।
उम्मीद है आपको यह कहानी दिल तक पहुंची होगी। अगर आपके मन में भी कोई ऐसा अनुभव है या आप कुछ कहना चाहते हैं, तो जरूर साझा करें। फिर मिलेंगे एक और ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी के साथ!

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