दोस्तों! कैसे हैं आप सब?
आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाना चाहता हूँ जो शायद आपने पहले कभी सुनी हो, लेकिन जिस गहराई से मैंने इसे महसूस किया है, वह वाकई हैरान कर देने वाली है। हम अक्सर सुख-सुविधाओं और पैसे के पीछे भागते हैं, है न? लेकिन आज बात करेंगे एक ऐसे शख्स की जिसने इन सब चीजों को कचरा समझकर छोड़ दिया।
बात हो रही है साधु सुंदर सिंह की। लुधियाना का एक बेहद अमीर सिख परिवार, घर में नौकर-चाकर, मखमल के बिस्तर और वो रुतबा कि लोग देखते रह जाएँ। पर क्या आपने कभी सोचा है कि एक लड़का जिसके पास सब कुछ था, उसने अचानक पश्चिमी सूट-बूट उतारकर एक भगवा चोला क्यों पहन लिया? और वो भी तब, जब उसने ईसाई धर्म अपना लिया था।
आईए अब जानते हैं कि आखिर उस बंदे के दिमाग में क्या चल रहा था।
रईसी से रूहानियत की तरफ मुड़ने की छटपटाहट
मेरे प्यारे दोस्तों, सुंदर सिंह कोई आम लड़का नहीं था। उसकी माँ एक बहुत ही धार्मिक महिला थीं और उन्होंने बचपन से ही उसे साधु-संतों की संगति में बिठाया था। लेकिन जैसे-जैसे सुंदर बड़ा हुआ, उसके मन में धर्म को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे। उसे शांति नहीं मिल रही थी।
जहाँ तक वास्तविकता की बात है, उसे ईसाइयत से तो नफरत थी। इतनी नफरत कि एक बार उसने बाइबल के पन्ने तक जला दिए थे। लेकिन दिल के किसी कोने में एक खालीपन था जिसे न तो घर की अमीरी भर पा रही थी और न ही पुराने रीति-रिवाज।
एक रात ऐसी आई जिसने सब कुछ बदल दिया। उन्होंने तय कर लिया था कि या तो आज खुदा खुद सामने आएगा या फिर वो अपनी जान दे देंगे। और फिर जो हुआ, वो इतिहास है। उन्हें ईसा मसीह का दर्शन हुआ। अब यहाँ से कहानी एक नया मोड़ लेती है। उनके परिवार ने उन्हें बहुत समझाया, लालच दिया, यहाँ तक कि उन्हें जहर देने की कोशिश भी की गई, लेकिन सुंदर सिंह अपना फैसला कर चुके थे।
पश्चिमी सूट और भारतीय मिट्टी का टकराव
अब आपके मन में सवाल आएगा कि भाई, जब वो ईसाई बन ही गए थे, तो उस वक्त के चलन के हिसाब से उन्हें कोट-पेंट पहनना चाहिए था। उस जमाने में मिशनरी लोग अक्सर पश्चिमी पहनावे को ही सभ्यता की निशानी मानते थे। लेकिन सुंदर सिंह ने कुछ अलग ही सोचा।
मुझे लगता है, उन्होंने बहुत गहराई से इस बात को समझा था कि भारत के लोगों को अगर कुछ समझाना है, तो उन्हीं की भाषा और उन्हीं के रंग में रंगना पड़ेगा। मैंने देखा है कि हम भारतीय किसी 'साहब' से उतना नहीं जुड़ पाते, जितना एक 'साधु' से जुड़ जाते हैं।
सुंदर सिंह का मानना था कि "ईसाई धर्म का पानी तो जीवन देने वाला है, लेकिन उसे भारतीय प्याले में पिलाना होगा।" कितनी गहरी बात है न? उन्होंने देखा कि अगर वो सूट पहनकर गाँवों में जाएँगे, तो लोग उन्हें एक 'विदेशी एजेंट' समझेंगे। वो नहीं चाहते थे कि लोग उनके कपड़ों को देखकर उनसे दूरी बना लें।
भगवा चोला: त्याग और पहचान का प्रती वहक
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं उस भगवा चोले की। साधु सुंदर सिंह ने भगवा रंग ही क्यों चुना? देखिए, भारत में भगवा रंग त्याग और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। जब उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, तो उन्होंने इसे कोई नया या विदेशी धर्म नहीं माना, बल्कि इसे अपने जीवन की पूर्णता माना।
जैसा कि मैंने अनुभव किया है, पहनावा सिर्फ कपड़ा नहीं होता, वो एक संदेश होता है। सुंदर सिंह ने जब वो लंबा भगवा चोला पहना और सर पर पगड़ी बांधी, तो वो एक 'ईसाई साधु' बन गए। एक ऐसा साधु जो नंगे पैर चलता था, जिसके पास रहने को कोई घर नहीं था और जो सिर्फ प्यार का संदेश देता था।
एक बार का छोटा सा किस्सा सुनाता हूँ। सुंदर सिंह जब विदेश (इंग्लैंड और अमेरिका) गए, तो वहाँ के लोग उन्हें देखकर दंग रह गए। उन्हें लगा कि ईसा मसीह के समय का कोई शख्स साक्षात उनके सामने आ गया है। जहाँ पश्चिमी ईसाई लोग धर्म को एक रस्म की तरह निभा रहे थे, वहीं यह भारतीय साधु धर्म को जी रहा था।
साधु सुंदर सिंह का 'साधु' बनने का असल मकसद
दोस्तों, असली वजह सिर्फ दिखावा नहीं थी। सुंदर सिंह का मकसद था— सादगी।
वो जानते थे कि अगर वो एक अमीर पादरी की तरह रहेंगे, तो वो कभी भी हिमालय की गुफाओं में रहने वाले लोगों या दूर-दराज के गाँवों के गरीबों तक नहीं पहुँच पाएंगे। उन्होंने तय किया कि वो एक फकीर की जिंदगी जिएंगे।
सोचिए, एक बंदा जिसके घर में चाँदी के बर्तनों में खाना परोसा जाता था, वो अब पेड़ के नीचे सो रहा था और जो रूखा-सूखा मिल जाए, उसे खाकर खुश था। मुझे तो सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि कितनी हिम्मत चाहिए होती है ऐसा फैसला लेने के लिए। उन्होंने अपने चोले को ही अपना घर बना लिया था।
तिब्बत की बर्फीली राहें और वो फकीरी
सुंदर सिंह का दिल तिब्बत के लिए धड़कता था। वो बार-बार उस दुर्गम इलाके में जाते थे जहाँ जाना मौत को दावत देने जैसा था। अब आप ही बताइए, क्या कोई सूट-बूट पहनकर उन पहाड़ों की चढ़ाई कर सकता था? बिल्कुल नहीं।
उनका वो चोला और उनकी सादगी ही थी जिसने उन्हें हर जगह स्वीकार्य बनाया। कई बार उन्हें जेल में डाला गया, कई बार उन्हें मारने की कोशिश हुई, लेकिन उनकी मुस्कान और उनका शांत स्वभाव कभी नहीं बदला। उन्होंने साबित कर दिया कि ईसाई होना कोई पश्चिमी सभ्यता को अपनाना नहीं है, बल्कि दिल का मामला है।
मेरे निजी विचार: उन्होंने हमें क्या सिखाया?
ईमानदारी से कहूँ तो, साधु सुंदर सिंह की कहानी पढ़ते वक्त मुझे महसूस हुआ कि हम अक्सर बाहरी दिखावे में इतना खो जाते हैं कि अपनी जड़ें भूल जाते हैं। सुंदर सिंह ने अपनी भारतीयता को कभी नहीं छोड़ा। वो ईसाई थे, लेकिन उससे भी पहले वो एक ऐसे भारतीय थे जिन्हें अपनी संस्कृति से प्यार था।
उन्होंने सिखाया कि अगर आप किसी के दिल तक पहुँचना चाहते हैं, तो आपको उनके जैसा बनना पड़ेगा। उन्होंने धर्म के नाम पर दीवारें नहीं खड़ी कीं, बल्कि पुल बनाए। आज के दौर में जब हर तरफ दिखावा है, सुंदर सिंह की यह फकीरी हमें बहुत कुछ सिखाती है।
क्या यह फैसला सही था?
अक्सर लोग बहस करते हैं कि क्या उन्हें भगवा पहनना चाहिए था? कुछ ईसाइयों को उस वक्त लगा कि ये गलत है। लेकिन अगर आप इतिहास उठाकर देखें, तो सुंदर सिंह ने जो असर छोड़ा, वो कोई और नहीं छोड़ पाया। उनकी उस सादगी ने हज़ारों लोगों के दिलों को छुआ।
उन्होंने दिखाया कि भक्ति के लिए आलीशान चर्च की जरूरत नहीं है, जंगल की एक खामोश जगह भी इबादतगाह बन सकती है। उनका वो भगवा चोला इस बात का सबूत था कि उन्होंने दुनिया को पूरी तरह से त्याग दिया है।
प्यारे दोस्तों, आज जब मैं इस ब्लॉग को लिख रहा हूँ, तो मुझे उनकी वो आखिरी यात्रा याद आ रही है। 1929 में वो फिर से तिब्बत की ओर निकले और उसके बाद कभी वापस नहीं आए। किसी को नहीं पता वो कहाँ गए, उनकी मृत्यु कैसे हुई। लेकिन उनका वो संदेश आज भी जिंदा है।
उन्होंने सूट छोड़ा क्योंकि उन्हें 'साहब' नहीं, 'सेवक' बनना था। उन्होंने रईसी छोड़ी क्योंकि उन्हें 'शांति' चाहिए थी। और उन्होंने भगवा पहना क्योंकि वो भारत के बेटे थे और अपनी मिट्टी की खुशबू के साथ दुनिया को खुदा का पैगाम देना चाहते थे।
उम्मीद है आपको सुंदर सिंह के जीवन का यह पहलू पसंद आया होगा। क्या आपको भी लगता है कि पहनावे से ज्यादा इंसान की नीयत मायने रखती है? मुझे जरूर बताइएगा।
अगली बार फिर मिलेंगे किसी ऐसी ही दिल को छू लेने वाली कहानी के साथ। तब तक अपना ख्याल रखें और अपनों के साथ खुश रहें!

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें