नमस्ते दोस्तों!
कैसे हैं आप सब? आज मैं आपके साथ एक ऐसी कहानी साझा करना चाहता हूँ जिसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। जब हम 'साधु' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में भगवा चोला पहने किसी सन्यासी की तस्वीर उभरती है, लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे साधु के बारे में सुना है जिसने मसीह की राह पर चलने के लिए सब कुछ त्याग दिया? और क्या उनकी तुलना इतिहास के उस महान संत से की जा सकती है जिसने पक्षियों से बातें कीं और गरीबी को अपनी 'दुल्हन' बना लिया?
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ भारत के साधु सुंदर सिंह और इटली के असीसी के सेंट फ्रांसिस की। जहाँ तक वास्तविकता की बात है, इन दोनों के बीच सदियों और मीलों का फासला था, लेकिन इनकी रूह एक ही तार से जुड़ी लगती है।
लुधियाना के महलों से तिब्बत की बर्फीली राहों तक
मेरे प्यारे दोस्तों, कल्पना कीजिए एक ऐसे लड़के की जिसका जन्म पंजाब के लुधियाना के एक बेहद अमीर और रसूखदार सिख परिवार में हुआ हो। सुंदर सिंह के पास वह सब कुछ था जो एक इंसान चाहता है—दौलत, मान-सम्मान और सुख-सुविधाएं। लेकिन जैसा कि मैंने अनुभव किया है, असली प्यास अक्सर सोने के बर्तनों से नहीं बुझती।
अपनी माँ की मृत्यु के बाद सुंदर सिंह इतने परेशान हुए कि उन्होंने गुस्से में आकर बाइबल तक जला दी थी। लेकिन फिर एक रात, उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उन्होंने फैसला किया था कि अगर ईश्वर नहीं मिला, तो वो जान दे देंगे। और तभी उन्हें ईसा मसीह का दर्शन हुआ। अब सोचिए, एक कट्टर सिख परिवार के लिए यह कितनी बड़ी बात रही होगी! उनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया, यहाँ तक कि उन्हें ज़हर देने की कोशिश भी की गई।
लेकिन सुंदर सिंह रुके नहीं। उन्होंने भगवा चोला पहना, सिर पर पगड़ी बाँधी और नंगे पैर निकल पड़े। उन्होंने कहा, "मैं ईसाइयत का प्रचार करने के लिए पश्चिमी कपड़े नहीं पहनूँगा, मैं एक 'भारतीय साधु' बनकर ही मसीह की बात कहूँगा।" मैंने देखा है कि लोग अक्सर अपनी जड़ों को भूल जाते हैं, पर सुंदर सिंह ने अपनी भारतीयता को मसीह के प्यार के साथ ऐसा बुना कि दुनिया देखती रह गई।
असीसी के फ्रांसिस: अमीरी को ठुकराने वाला एक और 'पागल'
अब थोड़ा पीछे चलते हैं, 13वीं सदी के इटली में। वहां भी एक ऐसा ही नौजवान था—फ्रांसिस। वह भी एक अमीर कपड़े के व्यापारी का बेटा था। वह ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीता था, पार्टियाँ करता था और शूरवीर बनने के सपने देखता था। लेकिन एक जंग ने उसे बदल दिया।
एक किस्सा मुझे बहुत पसंद है। एक दिन फ्रांसिस एक टूटे हुए चर्च (सान दमियानो) में प्रार्थना कर रहे थे, तभी उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी— "फ्रांसिस, जाओ और मेरे घर को ठीक करो।" उन्हें लगा शायद पत्थर और गारे से चर्च की मरम्मत करनी है, लेकिन असल में उन्हें तो लोगों के दिलों की मरम्मत करनी थी।
फ्रांसिस ने अपने पिता के सामने अपने सारे कीमती कपड़े उतार दिए और नग्न होकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, "आज से मेरे पिता धरती के पीटर नहीं, बल्कि स्वर्ग के परमेश्वर हैं।" यह पागलपन नहीं तो और क्या था? लेकिन यही वह पागलपन है जो दुनिया को बदल देता है।
सादगी और गरीबी: दो रूहों का एक जैसा सफ़र
आईए अब जानते हैं कि इन दोनों में समानता क्या थी। दोनों ने 'गरीबी' को मजबूरी नहीं, बल्कि एक चुनाव (Choice) बनाया। सेंट फ्रांसिस ने 'लेडी पॉवर्टी' (गरीबी रूपी महिला) से विवाह करने की बात कही थी। वहीं साधु सुंदर सिंह का पूरा जीवन एक कंबल और एक बाइबल के इर्द-गिर्द सिमटा था।
मुझे लगता है कि आज के दौर में जहाँ हम हर चीज़ को इकट्ठा करने की दौड़ में लगे हैं, इन दोनों का जीवन हमें रुककर सोचने पर मजबूर करता है। सुंदर सिंह तिब्बत की उन बर्फीली पहाड़ियों में चले जाते थे जहाँ आम इंसान जाने से डरता था। क्यों? सिर्फ इसलिए ताकि वो लोगों को प्यार का संदेश दे सकें। ठीक वैसे ही, जैसे फ्रांसिस ने कुष्ठ रोगियों (Leprosy patients) को गले लगाया था, जिनसे उस समय पूरी दुनिया नफरत करती थी।
प्रकृति और जानवरों से प्रेम
आपने सेंट फ्रांसिस की वो कहानियाँ तो सुनी ही होंगी जहाँ वो पक्षियों को उपदेश देते थे। लोग उन्हें 'कुदरत का संत' कहते थे। साधु सुंदर सिंह भी कुछ कम नहीं थे। हिमालय की गुफाओं में रहते हुए, वो अक्सर जंगली जानवरों के बीच घिरे रहते थे। उनके अनुभवों में ज़िक्र मिलता है कि कैसे तेंदुए और भालू उनके पास शांति से बैठ जाते थे।
यहाँ एक बहुत गहरी बात है। जब इंसान के भीतर का डर खत्म हो जाता है और वह हर जीव में ईश्वर को देखने लगता है, तो कुदरत भी उसके सामने झुक जाती है। साधु सुंदर सिंह कहते थे कि "प्रकृति ईश्वर की दूसरी किताब है।" क्या यह बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा फ्रांसिस सोचते थे?
दुखों में आनंद की तलाश
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और एक बहुत ही कड़वी सच्चाई पर बात करते हैं—कष्ट। सुंदर सिंह को जेल में डाला गया, उन्हें जोकों से भरे कुएं में फेंका गया, लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। वो कहते थे कि उस नरक जैसे कुएं में भी उन्हें 'स्वर्ग' का अनुभव हुआ।
बिल्कुल इसी तरह, सेंट फ्रांसिस के शरीर पर 'स्टिग्माटा' (मसीह के ज़ख्मों के निशान) उभरे थे। उन्हें आँखों की गंभीर बीमारी थी और वो बहुत दर्द में थे, फिर भी उन्होंने "Canticle of the Sun" जैसा खूबसूरत और आनंद से भरा गीत लिखा। ये दोनों हमें सिखाते हैं कि खुशी बाहर की परिस्थितियों में नहीं, बल्कि अंदर के सुकून में होती है।
क्या था इनका मुख्य संदेश?
अगर मैं इसे सरल शब्दों में कहूँ, तो सुंदर सिंह 'पूर्व' की आत्मा थे और फ्रांसिस 'पश्चिम' की। लेकिन दोनों का मकसद एक ही था—धर्म की बेड़ियों को तोड़कर ईश्वर के साथ एक सीधा रिश्ता बनाना। सुंदर सिंह ने कभी नहीं चाहा कि भारत के लोग यूरोपीय ईसाई बनें। वो चाहते थे कि भारत के लोग 'मसीह के पीछे चलने वाले' बनें, लेकिन अपनी संस्कृति को साथ रखकर।
साधु सुंदर सिंह अक्सर एक उदाहरण देते थे: "दूध को किसी भी बर्तन में डालो, दूध तो दूध ही रहेगा।" उनका मतलब था कि मसीह का संदेश किसी भी संस्कृति के बर्तन में पेश किया जा सकता है।
एक रहस्यमयी अंत
साधु सुंदर सिंह का अंत भी उनके जीवन की तरह ही रहस्यमयी था। 1929 में वो आखिरी बार तिब्बत की ओर निकले और फिर कभी लौटकर नहीं आए। किसी को नहीं पता कि वो बर्फ में कहीं खो गए या किसी गुफा में समाधि ले ली। वहीं फ्रांसिस ने अपनी मृत्यु का स्वागत एक 'बहन' की तरह किया।
मेरे दोस्तों, आज जब हम अपनी व्यस्त ज़िंदगी में उलझे हुए हैं, तो इन दो महान व्यक्तित्वों की तुलना हमें एक बहुत बड़ा सबक देती है। वो सबक यह है कि सच्ची महानता इसमें नहीं है कि आपके पास कितना है, बल्कि इसमें है कि आपने दूसरों के लिए और अपने विश्वास के लिए क्या छोड़ा है।
क्या हमें भी अपनी ज़िंदगी में थोड़ा सा 'साधु' बनने की ज़रूरत नहीं है? थोड़ा सरल, थोड़ा दयालु और थोड़ा और निस्वार्थ?
मुझे लगता है कि साधु सुंदर सिंह और सेंट फ्रांसिस आज भी हमें पुकार रहे हैं। वो हमें याद दिला रहे हैं कि प्यार ही वो इकलौती भाषा है जो हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर इटली के पुराने शहरों तक हर कोई समझता है।
उम्मीद है कि इन दो महान संतों की यह छोटी सी झलक आपको पसंद आई होगी। अगली बार फिर मिलेंगे ऐसी ही किसी दिल छू लेने वाली कहानी के साथ! तब तक अपना ख्याल रखिए और प्यार फैलाते रहिए।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें