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जब सुंदर सिंह ने अपनी बाइबिल जलाई थी: उनके हृदय परिवर्तन से पहले की कहानी

 मेरे प्यारे दोस्तों,

आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाना चाहता हूँ जो शायद आपने पहले कभी न सुनी हो। यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जिसने अपनी नफरत की आग में उस किताब को जला दिया जिसे आज आधी से ज्यादा दुनिया पवित्र मानती है। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने न केवल उनकी जिंदगी बदल दी, बल्कि उन्हें 'एशिया का प्रेरित' (Apostle of the East) बना दिया।

साधु सुंदर सिंह का हृदय, सागर सुंदर सिंह की प्रकृति।


जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ साधु सुंदर सिंह की।

लुधियाना के एक रईस परिवार का लाडला

जरा कल्पना कीजिए, 1889 का दौर है। पंजाब के लुधियाना जिले का एक गाँव 'रामपुर'। यहाँ एक बहुत ही रईस सिख परिवार रहता था। सुंदर सिंह इसी परिवार के सबसे लाडले बेटे थे। उनके पिता शेर सिंह के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी।

बचपन में सुंदर सिंह को हर वह सुख-सुविधा मिली जो एक राजकुमार को मिलती है। लेकिन उनकी माँ, जो एक बहुत ही धार्मिक महिला थीं, उन्होंने सुंदर को हमेशा एक ही बात सिखाई— "बेटा, दुनिया की दौलत आज है कल नहीं, लेकिन ईश्वर की शांति सदा बनी रहती है। तुम्हें एक साधु बनना चाहिए।"

मुझे लगता है कि माँ की इसी बात ने सुंदर के छोटे से मन में 'ईश्वर को पाने' की एक ऐसी प्यास जगा दी, जो आगे चलकर आग बन गई।

जब शांति की तलाश बेचैनी बन गई

सुंदर सिंह सिर्फ सात साल के थे जब उन्होंने भगवद गीता का पाठ शुरू कर दिया था। फिर उन्होंने कुरान पढ़ी, योग सीखा और घंटों ध्यान लगाया। उनके परिवार को लगा कि लड़का धर्म की राह पर है, सब ठीक है। लेकिन असलियत में सुंदर सिंह अंदर से बहुत परेशान थे।

जैसा कि मैंने अनुभव किया है, कभी-कभी हम जितना ज्यादा किसी चीज को पाने की कोशिश करते हैं, वह हमसे उतनी ही दूर चली जाती है। सुंदर के साथ भी यही हो रहा था। उन्हें कहीं भी वह सुकून नहीं मिल रहा था जिसकी उनकी माँ बात करती थी।

इसी बीच, उनके स्कूल में ईसाई मिशनरियों ने उन्हें 'बाइबिल' पढ़ाना शुरू किया। और यहीं से शुरू हुआ उनके जीवन का सबसे काला अध्याय।

नफरत की आग और जलती हुई बाइबिल

अब यहाँ कहानी में एक मोड़ आता है। सुंदर सिंह को ईसाइयत से चिढ़ होने लगी। उन्हें लगता था कि यह कोई विदेशी धर्म है जो उनके अपने धर्म और संस्कृति के खिलाफ है। वह बाइबिल की बातों को सुनकर गुस्सा हो जाते थे।

फिर एक दिन वह घटना हुई जिसने सबको हैरान कर दिया। 14 दिसंबर, 1904 की बात है। सुंदर सिंह अपने घर के आंगन में बैठे थे। उनके हाथ में एक बाइबिल थी। उन्होंने अपने पिता और दोस्तों के सामने उस बाइबिल के पन्ने फाड़े और उसे आग के हवाले कर दिया।

मुझे लगता है, उस समय उनके मन में यह चल रहा होगा कि इस किताब को जलाकर वह उस बेचैनी को भी जला देंगे जो उन्हें परेशान कर रही थी। लेकिन क्या आग से कभी आग बुझती है? बिल्कुल नहीं।

बाइबिल जलाने के बाद सुंदर सिंह की मानसिक हालत और भी खराब हो गई। उन्हें लगा कि उन्होंने बहुत बड़ा पाप कर दिया है। उस रात वह सो नहीं पाए।

वह आखिरी रात और खुदकुशी का फैसला

आईए अब जानते हैं उस रात के बारे में जिसने इतिहास बदल दिया। 18 दिसंबर, 1904। सुंदर सिंह ने फैसला कर लिया था कि अगर आज रात उन्हें शांति नहीं मिली, तो वह अपनी जान दे देंगे।

उन्होंने तय किया कि वह सुबह पाँच बजे आने वाली लुधियाना एक्सप्रेस के नीचे कटकर मर जाएंगे। उन्होंने ठंडे पानी से स्नान किया और प्रार्थना की— "हे ईश्वर, अगर तू कहीं है, तो मुझे रास्ता दिखा, वरना मैं अपना अंत कर लूँ।"

जहाँ तक वास्तविकता की बात है, जब इंसान हार मान लेता है, तभी शायद ईश्वर का काम शुरू होता है।

जब कमरे में रोशनी छा गई

सुबह के करीब 4:30 बज रहे थे। सुंदर सिंह ट्रेन की पटरी की तरफ जाने की तैयारी में थे। अचानक उनके कमरे में एक अजीब सी रोशनी फैल गई। सुंदर को लगा कि शायद कमरे में आग लग गई है, लेकिन वहाँ कोई धुआँ नहीं था।

तभी उन्होंने उस रोशनी के बीच एक चेहरा देखा। वह चेहरा कोई हिंदू देवता या सिख गुरु का नहीं था। वह चेहरा ईसा मसीह (जीसस) का था।

सुंदर सिंह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मसीह ने उनसे कहा— "तू मुझे क्यों सताता है? याद रख, मैंने तेरे लिए अपनी जान दी।"

उस एक पल ने सब कुछ बदल दिया। सुंदर सिंह, जो कुछ घंटों पहले मसीह के नाम से नफरत करते थे, उनके पैरों में गिर पड़े। उन्होंने महसूस किया कि जो शांति वह हिमालय की गुफाओं और तीर्थों में खोज रहे थे, वह उनके सामने खड़ी थी।

परिवार का विरोध और जहर का प्याला

अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं उस संघर्ष की ओर जो इसके बाद शुरू हुआ। जब सुंदर ने अपने पिता को बताया कि वह ईसाई बन गए हैं, तो उनके घर में जैसे भूचाल आ गया। उनके पिता ने कहा, "सुंदर, तुम हमारे खानदान का नाम मिट्टी में मिला रहे हो।"

उन्हें लालच दिया गया, डराया गया, लेकिन सुंदर टस से मस नहीं हुए। आखिरकार, उनके अपने ही परिवार ने उन्हें खाने में जहर देकर घर से निकाल दिया। उन्हें एक अछूत की तरह घर से बाहर कर दिया गया।

मैंने देखा है कि जब कोई अपनी सच्चाई पर अड़ जाता है, तो पूरी दुनिया उसके खिलाफ हो जाती है। सुंदर सिंह रात भर कड़कड़ाती ठंड में एक पेड़ के नीचे पड़े रहे। जहर की वजह से वह मरने ही वाले थे, लेकिन चमत्कारिक रूप से उनकी जान बच गई।

एक अमीर सिख से 'ईसाई साधु' तक का सफर

सुंदर सिंह ने सोचा कि अगर उन्हें मसीह का संदेश लोगों तक पहुँचाना है, तो उन्हें किसी विदेशी पादरी की तरह दिखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने केसरिया चोला पहना और एक हाथ में बाइबिल लेकर निकल पड़े।

वह पहले ऐसे इंसान थे जिन्होंने ईसाइयत को भारतीय रंग में ढाला। वह कहते थे, "मैं भारतीयों को जीवन का जल (Water of Life) एक भारतीय प्याले में देना चाहता हूँ।"

लुधियाना के उस रईस खानदान का बेटा अब सड़कों पर नंगे पैर घूम रहा था। उनके पास न घर था, न पैसा। लेकिन उनके चेहरे पर वह शांति थी, जो उन्होंने उस आग की रात में पाई थी।

तिब्बत की कठिन यात्राएं

सुंदर सिंह का सबसे बड़ा जुनून था तिब्बत जाना। उस समय तिब्बत में ईसाइयत का प्रचार करना मौत को बुलावा देने जैसा था। लेकिन सुंदर को डर नहीं लगता था। वह कई बार तिब्बत गए, उन्हें जेल में डाला गया, भूखे कुओं में फेंका गया, लेकिन वह हर बार बचकर निकल आए।

उनके किस्से सुनकर लोग दंग रह जाते थे। जैसे एक बार उन्हें एक कुएं में फेंक दिया गया था जहाँ सिर्फ हड्डियाँ और बदबू थी, लेकिन तीन दिन बाद एक अनजान व्यक्ति ने रस्सी डालकर उन्हें बाहर निकाला। वह व्यक्ति कौन था, यह आज भी एक रहस्य है।

अंत या एक नई शुरुआत?

1929 में, साधु सुंदर सिंह अपनी आखिरी तिब्बत यात्रा पर निकले। उस समय उनकी सेहत बहुत खराब थी, लेकिन उनका जज्बा कम नहीं हुआ था। वह तिब्बत की पहाड़ियों में कहीं ओझल हो गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे।

आज तक कोई नहीं जानता कि उनका अंत कैसे हुआ। लेकिन क्या वह वाकई मर गए? मुझे नहीं लगता। उनके विचार और उनकी कहानी आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है।

मेरे प्यारे दोस्तों, साधु सुंदर सिंह की कहानी हमें सिखाती है कि नफरत का अंत सिर्फ प्यार और रोशनी से हो सकता है। वह एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने दुनिया की सारी दौलत छोड़ दी ताकि वह उस एक 'मोती' को पा सकें जिसे वह शांति कहते थे।

जैसा कि मैंने अनुभव किया, असली बदलाव तब नहीं आता जब हम दूसरों को बदलते हैं, बल्कि तब आता है जब हम खुद को ईश्वर के हाथों में सौंप देते हैं।

तो यह थी कहानी उस महान आत्मा की, जिसने आग से शुरू किया और रोशनी पर खत्म। उम्मीद है आपको यह ब्लॉग पसंद आया होगा। अगर आपके मन में कोई सवाल हो या आप कुछ और जानना चाहते हों, तो मुझे जरूर बताइएगा।

मिलते हैं अगले ब्लॉग में!

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