मेरे प्यारे दोस्तों,
आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाना चाहता हूँ जो केवल धर्म की नहीं, बल्कि एक अटूट संकल्प और रूहानी प्यास की दास्तान है। हम अक्सर इतिहास को किताबों के पन्नों में ढूंढते हैं, लेकिन कभी-कभी इतिहास की सबसे बड़ी गूँज किसी शांत पहाड़ी शहर की पुरानी इमारतों में छिपी होती है। आज हम बात करेंगे शिमला के उस खूबसूरत 'सेंट थॉमस चर्च' की, जहाँ एक ऐसे इंसान का नया जन्म हुआ जिसने पूरी दुनिया को अपनी सादगी और भक्ति से हैरान कर दिया। जी हां, मैं बात कर रहा हूँ—साधु सुंदर सिंह की।
लुधियाना का वो रईस घराना और एक बेचैन दिल
आगे बढ़ने से पहले, ज़रा कल्पना कीजिए पंजाब के लुधियाना के एक बेहद अमीर और रसूखदार सिख परिवार की। सुंदर सिंह का जन्म 1889 में इसी वैभव के बीच हुआ था। उनके पास वो सब कुछ था जिसे दुनिया 'सुख' कहती है—दौलत, नाम और भविष्य की सुरक्षा। लेकिन जहाँ तक वास्तविकता की बात है, उनके मन के भीतर एक अजीब सी बेचैनी थी।
उनकी माँ एक बहुत ही धार्मिक महिला थीं। वे अक्सर उन्हें संतों और ऋषियों की संगति में ले जाती थीं। सुंदर सिंह बचपन से ही सत्य की खोज में थे। लेकिन जब उनकी माँ का साया उनके सिर से उठ गया, तो जैसे उनकी दुनिया ही उजड़ गई। उनके मन में धर्म के प्रति एक नफरत सी पैदा हो गई। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस शख्स को आज हम 'ईसाई साधु' कहते हैं, एक वक्त उन्होंने गुस्से में आकर बाइबिल के पन्ने तक जला दिए थे।
वो रात जब सब कुछ बदल गया
अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं उस घटना की तरफ, जिसने सुंदर सिंह की ज़िंदगी को पूरी तरह पलट दिया। जैसा कि मैंने अनुभव किया है, हमारी ज़िंदगी के सबसे बड़े मोड़ अक्सर सबसे अंधेरी रातों में आते हैं। 15 दिसंबर, 1904 की वो सर्द रात थी। सुंदर सिंह ने तय कर लिया था कि अगर आज उन्हें ईश्वर के दर्शन नहीं हुए, तो वे लुधियाना रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के नीचे आकर अपनी जान दे देंगे।
वे घंटों प्रार्थना करते रहे। और फिर, सुबह होने से ठीक पहले, उन्हें एक दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उन्होंने ईसा मसीह को अपने सामने देखा। बस, वही वो पल था जब लुधियाना का वो नौजवान हमेशा के लिए बदल गया। उन्होंने तय कर लिया कि अब उनकी पूरी ज़िंदगी इसी मार्ग पर चलेगी।
शिमला का सेंट थॉमस चर्च: एक ऐतिहासिक गवाह
जब सुंदर सिंह ने ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया, तो उनके परिवार ने उन्हें बहुत समझाया। उन्हें ज़हर तक देने की कोशिश की गई, उन्हें घर से निकाल दिया गया, लेकिन सुंदर अपने फैसले पर अडिग थे। अब सवाल था उनके आधिकारिक तौर पर ईसाई धर्म में शामिल होने का, जिसे हम 'बपतिस्मा' (Baptism) कहते हैं।
यहीं पर एंट्री होती है शिमला के 'सेंट थॉमस चर्च' की। शिमला की माल रोड के पास स्थित यह लाल रंग का छोटा सा चर्च आज भी अपनी गरिमा के साथ खड़ा है। 3 सितंबर, 1905 का वो ऐतिहासिक दिन था। शिमला की ठंडी हवाओं के बीच, इसी चर्च में सुंदर सिंह ने बपतिस्मा लिया।
मुझे लगता है, उस दिन सिर्फ एक इंसान ने धर्म नहीं बदला था, बल्कि एक नई परंपरा ने जन्म लिया था। पादरी जे. रेडमैन ने उन्हें बपतिस्मा दिया। उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि 16 साल का यह लड़का आने वाले समय में दुनिया भर में 'हिमालय के प्रेरित' (Apostle of the Himalayas) के नाम से जाना जाएगा।
भगवा चोला और मसीह की राह
अब आइए जानते हैं उस अनोखे रूप के बारे में जिसने सबको चकित कर दिया। बपतिस्मा लेने के बाद, सुंदर सिंह ने कोई पश्चिमी कोट-पेंट नहीं पहना। उन्होंने एक साधु का भगवा चोला धारण किया। उनका तर्क बहुत सीधा और दिल को छू लेने वाला था। उन्होंने देखा था कि लोग साधुओं का सम्मान करते हैं और उनकी बात सुनते हैं। वे मसीह के संदेश को भारतीय रंग में ढालना चाहते थे।
मैंने देखा है कि अक्सर लोग धर्म को कपड़ों से जोड़ते हैं, लेकिन सुंदर सिंह ने दिखाया कि भक्ति दिल में होती है। वे नंगे पैर, हाथ में बाइबिल लिए पहाड़ों और जंगलों की यात्रा पर निकल पड़े। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदू साधु की जीवनशैली और ईसाई धर्म की शिक्षाओं का ऐसा मेल बिठाया जो पहले कभी नहीं देखा गया था।
शिमला के चर्च का आज का महत्व
आज जब हम शिमला घूमने जाते हैं, तो माल रोड की भीड़-भाड़ में शायद इस छोटे से चर्च को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन जहां तक मेरी राय है, यह जगह किसी तीर्थ से कम नहीं है। सेंट थॉमस चर्च न केवल अपनी वास्तुकला के लिए मशहूर है, बल्कि यह उस साहस की याद दिलाता है जो सुंदर सिंह ने दिखाया था।
यह चर्च आज भी हमें याद दिलाता है कि सच्चाई की राह पर चलना कभी आसान नहीं होता। जब सुंदर सिंह ने यहाँ कदम रखा था, तो उनके पास न तो घर था और न ही परिवार का साथ। उनके पास था तो सिर्फ एक अटूट विश्वास। आज भी इस चर्च की दीवारों में उस दिन की प्रार्थनाओं की गूँज महसूस की जा सकती है।
तिब्बत की दुर्गम यात्राएँ और रहस्यमयी ओझल होना
साधु सुंदर सिंह की कहानी शिमला के इस चर्च से शुरू होकर तिब्बत की बर्फीली चोटियों तक जाती है। वे बार-बार तिब्बत गए, जहाँ ईसाई धर्म का प्रचार करना मौत को दावत देने जैसा था। उन्हें कई बार जेल में डाला गया, भूखा रखा गया, लेकिन उनकी मुस्कान कभी कम नहीं हुई।
साल 1929 में, वे एक बार फिर तिब्बत की ओर निकले, लेकिन उसके बाद वे कभी वापस नहीं लौटे। वे कहाँ गए, उनके साथ क्या हुआ, यह आज भी एक रहस्य है। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने पहाड़ों में ही अपनी देह त्याग दी, तो कुछ का मानना है कि वे किसी गुफा में ध्यान में लीन हो गए। पर असलियत तो यही है कि उनका काम और उनका नाम आज भी जिंदा है।
इस कहानी से हमें क्या मिलता है?
मेरे प्यारे दोस्तों, साधु सुंदर सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि अगर आपके भीतर कुछ पाने की सच्ची तड़प है, तो पूरी कायनात आपको रास्ता दिखाने आ जाती है। शिमला का वो सेंट थॉमस चर्च सिर्फ ईंटों और पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि उस परिवर्तन का प्रतीक है जो एक इंसान के भीतर घटित हो सकता है।
मुझे लगता है, हमें भी अपने जीवन में उस 'सत्य' की तलाश करनी चाहिए जिसे सुंदर सिंह ने पाया था। क्या हम अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर किसी ऊंचे उद्देश्य के लिए जी सकते हैं? यह सवाल थोड़ा कठिन है, लेकिन सुंदर सिंह का जीवन इसका जीता-जागता जवाब है।
तो अगली बार जब आप शिमला जाएं, तो मॉल रोड पर आइसक्रीम खाते हुए थोड़ा समय निकालिएगा। उस लाल रंग के छोटे से चर्च (सेंट थॉमस चर्च) के सामने खड़े होकर उस 16 साल के लड़के के बारे में सोचिएगा, जिसने पूरी दुनिया की दौलत को ठुकरा कर एक साधु का जीवन चुना। शायद आपको भी वहाँ जाकर वह शांति महसूस हो, जिसकी तलाश में सुंदर सिंह ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था।
सच तो यही है कि महान आत्माएं मरती नहीं हैं, वे हमारे विचारों और हमारे इतिहास की इन विरासतों में हमेशा जीवित रहती हैं। साधु सुंदर सिंह का बपतिस्मा इसी अमर कहानी का एक सुनहरी अध्याय है।

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