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यूरोप और अमेरिका की यात्रा पर साधु सुंदर सिंह के पश्चिमी सभ्यता के प्रति विचार

 मेरे प्यारे दोस्तों,

आज मैं आपसे एक ऐसे इंसान के बारे में बात करना चाहता हूँ, जिसकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। लुधियाना के एक बेहद अमीर सिख परिवार में जन्म लेना, सुख-सुविधाओं में पलना और फिर सब कुछ छोड़कर एक 'ईसाई साधु' बन जाना—सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम बात कर रहे हैं साधु सुंदर सिंह की।



साधु सुंदर सिंह ने जब मसीह की राह चुनी, तो उन्होंने पश्चिमी चोगा नहीं पहना। उन्होंने केसरिया वस्त्र पहने और नंगे पैर मीलों का सफर तय किया। लेकिन आज मैं आपको उनके उस अनुभव के बारे में बताना चाहता हूँ, जो उन्होंने अपनी यूरोप और अमेरिका की यात्राओं के दौरान महसूस किया।

पश्चिमी दुनिया की चमक-धमक और खोखलापन

जैसा कि मैंने अनुभव किया है, हम अक्सर सोचते हैं कि पश्चिम (West) के लोग बहुत उन्नत हैं, उनके पास सब कुछ है। सुंदर सिंह भी जब पहली बार वहां गए, तो उन्होंने कुछ और ही देखा। मुझे लगता है कि उन्हें वहां की चकाचौंध के पीछे छिपा एक गहरा खालीपन महसूस हुआ।

आईए अब जानते हैं कि उन्होंने वहां क्या देखा। सुंदर सिंह ने पाया कि पश्चिम के लोग ईसाइयत को एक धर्म की तरह तो मानते हैं, लेकिन उनके जीवन में वह रूहानियत (Spirituality) नहीं है जो होनी चाहिए। उन्होंने एक बार बहुत ही खूबसूरत बात कही थी, जो मुझे बहुत पसंद आई। उन्होंने कहा कि "ईसाई धर्म के सिद्धांत तो चट्टान की तरह मजबूत हैं, लेकिन पश्चिमी लोग उस चट्टान के पास बहती नदी की तरह हैं—नदी के अंदर रहने के बावजूद पत्थर सूखा ही रहता है।"

साधु सुंदर सिंह की नज़र में पश्चिमी ईसाइयत

जहां तक वास्तविकता की बात है, सुंदर सिंह को लगा कि यूरोप और अमेरिका के लोग मशीनों के गुलाम बन गए हैं। उनके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ थीं, ऊंचे मकान थे, पर शांति गायब थी। उन्होंने देखा कि लोग चर्च तो जाते थे, लेकिन उनका दिल अभी भी भौतिक सुखों में अटका हुआ था।

मैने देखा है कि सुंदर सिंह ने अपनी सभाओं में बहुत ही साफ लहजे में यह बात कही। उन्होंने गोरे लोगों को आइना दिखाया कि तुम जिसे 'सभ्यता' कहते हो, वह सिर्फ बाहरी दिखावा है। उन्होंने कहा कि असली सभ्यता वह है जो इंसान को अंदर से बदले।

भौतिकवाद का बढ़ता हुआ जाल

अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं उनके एक छोटे से किस्से की। सुंदर सिंह जब ब्रिटेन में थे, तो उनसे किसी ने पूछा कि आपको यहां कैसा लग रहा है? उन्होंने बहुत ही सादगी से जवाब दिया कि "मुझे अफ़सोस है कि यहाँ लोग अपनी आत्मा को शरीर की जरूरतों के नीचे दबा चुके हैं।"

मुझे लगता है, उनका यह विचार आज भी उतना ही सच है। हम आज भी पश्चिम की नकल करने में लगे हैं, यह सोचे बिना कि क्या वह हमें मानसिक शांति दे रहा है? सुंदर सिंह ने देखा कि वहां के लोग धर्म को एक 'कोट' की तरह इस्तेमाल करते थे—जब जरूरत हुई पहन लिया, जब मन किया उतार दिया।

क्या पश्चिम सच में 'ईसाई' था?

सुंदर सिंह का मानना था कि पश्चिम ने मसीह के संदेश को समझने में गलती की है। उन्होंने कहा कि "यीशु का जन्म एशिया में हुआ था, लेकिन पश्चिम ने उसे अपने सांचे में ढालने की कोशिश की।" उन्हें दुख होता था कि जिन लोगों ने पूरी दुनिया में मिशनरी भेजे, वे खुद ही अपने घर में मसीह को भूलते जा रहे थे।

मैंने उनके बारे में पढ़ते हुए यह महसूस किया कि उन्हें पश्चिमी सभ्यता की 'तेजी' से चिढ़ थी। वहां हर कोई भाग रहा था। किसी के पास रुककर प्रार्थना करने या खुद से बात करने का वक्त नहीं था। उन्होंने इसे 'आध्यात्मिक भुखमरी' का नाम दिया।

अमेरिका की यात्रा और उनके कड़वे अनुभव

जब वे अमेरिका पहुंचे, तो वहां की भौतिक उन्नति देखकर वे हैरान नहीं हुए, बल्कि और भी निराश हुए। उन्हें लगा कि पैसा और तकनीक इंसान को भगवान से दूर ले जा रहे हैं। उन्होंने वहां के लोगों को चेतावनी दी थी कि अगर तुम इसी तरह पदार्थ के पीछे भागते रहे, तो एक दिन तुम्हारे पास सब कुछ होगा, लेकिन तुम खुद को खो दोगे।

मेरे प्यारे दोस्तों, सोचिए आज से सौ साल पहले एक भारतीय साधु ने वह बात कह दी थी, जिसे हम आज महसूस कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा था कि पश्चिम के पास 'सिर' (दिमाग और विज्ञान) तो है, पर उनके पास 'दिल' की कमी है।

साधु सुंदर सिंह की विरासत और आज का दौर

अंत में, मैं बस यही कहूँगा कि साधु सुंदर सिंह की वह यात्रा सिर्फ भौगोलिक नहीं थी, वह संस्कृतियों का एक गहरा विश्लेषण था। उन्होंने दुनिया को बताया कि शांति किसी देश या सभ्यता की जागीर नहीं है। चाहे आप पंजाब के किसी गांव में हों या न्यूयॉर्क की किसी गगनचुंबी इमारत में, अगर आपका मन अशांत है, तो सारी सुविधाएं बेकार हैं।

उनकी बातें सुनकर हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम भी उसी खोखली चमक के पीछे तो नहीं भाग रहे? सुंदर सिंह ने हमें सिखाया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना और सादगी में जीना ही असली अमीरी है।

तो दोस्तों, साधु सुंदर सिंह के ये विचार हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। उम्मीद है आपको उनकी यह अनकही दास्तां पसंद आई होगी। अगली बार फिर मिलेंगे एक नई कहानी और एक नए अनुभव के साथ।

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