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साधु सुंदर सिंह की सादगी: बिना पैसों और सामान के पूरी दुनिया की यात्रा

 मेरे प्यारे दोस्तों! क्या आपने कभी बिना फोन, बिना पैसे और बिना किसी बैग के घर से बाहर कदम रखने की सोची है? शायद नहीं। आज के समय में तो हम बाजार तक भी बिना वॉलेट या यूपीआई के नहीं जाते। मैंने देखा है कि हम लोग किसी भी सफर पर जाने से पहले हफ्तों तक पैकिंग करते हैं। एक बैग कपड़ों का, एक जूतों का और एक गैजेट्स का।



लेकिन आज मैं आपको एक ऐसे इंसान की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसने बिना पैसों और बिना किसी सामान के पूरी दुनिया नाप दी। हां, आपने बिल्कुल सही सुना!

अब अधिक समय न लेते हुए आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं भारत के एक महान संत, साधु सुंदर सिंह की। उनकी जिंदगी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है।

 लुधियाना के एक अमीर सिख परिवार से बगावत

कहानी शुरू होती है पंजाब के लुधियाना जिले के पास स्थित रामगढ़ गांव से। साल 1889 में सुंदर सिंह का जन्म एक बहुत ही रईस और नामी सिख परिवार में हुआ था। उनके घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। महंगे कपड़े, अच्छा खाना, नौकर-चाकर—सुख-सुविधा का सब कुछ उनके पास था।

उनकी मां एक बहुत ही धार्मिक और नेक महिला थीं। वह अक्सर छोटे सुंदर को जंगलों में रहने वाले साधुओं की संगत में ले जाती थीं। वह बचपन से ही उसके मन में यह बात डाल रही थीं कि उसे दुनियादारी के पीछे नहीं भागना है, बल्कि बड़ा होकर एक सच्चा संत बनना है।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब सुंदर सिंह सिर्फ 14 साल के थे, तब उनकी मां का देहांत हो गया। इस घटना ने उस छोटे से बच्चे को अंदर तक तोड़ दिया। वह इतने निराश और गुस्से में आ गए कि उन्होंने भगवान और धर्म का ही विरोध करना शुरू कर दिया। उनके मन में इतनी कड़वाहट भर गई थी कि एक बार तो उन्होंने अपने ही स्कूल में ईसाई मिशनरियों की पवित्र बाइबिल के पन्नों को फाड़कर आग लगा दी थी।

 'ईसाई साधु' बनने तक का कठिन सफर

जहां तक वास्तविकता की बात है, जिंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ लेती है जिनकी हम सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते। ऐसा ही कुछ सुंदर सिंह के साथ हुआ।

मां के जाने के बाद उनका मन बहुत बेचैन रहता था। उन्हें शांति नहीं मिल रही थी। कहा जाता है कि एक रात उन्होंने तय किया कि अगर उन्हें भगवान के असली दर्शन नहीं हुए, तो वह सुबह होने से पहले लुधियाना एक्सप्रेस रेल की पटरी पर लेटकर अपनी जान दे देंगे। वह रात भर प्रार्थना करते रहे। और उसी रात, उन्हें अपने कमरे में एक तेज रोशनी दिखी और उन्हें ईसा मसीह के दर्शन हुए। इस एक पल ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी।

अगली सुबह उन्होंने अपने घर वालों को बताया कि वह अब ईसाई बनेंगे और अपना जीवन भगवान को सौंपेंगे। यह सुनकर उनके परिवार में मानो भूचाल आ गया। उनके पिता ने उन्हें बहुत समझाया। उन्हें जायदाद का लालच दिया, शादी की बात कही। जब वह नहीं माने, तो परिवार ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया। उन्हें घर से बेदखल कर दिया गया।

सोचिए जरा, जो लड़का कल तक महलों में रहता था, आज वह सड़क पर था। कई लोगों ने उनका विरोध किया। यहां तक कि उन्हें खाने में जहर तक दे दिया गया, लेकिन वह किसी तरह बच गए। बस यहीं से शुरू हुआ लुधियाना के एक अमीर सिख परिवार से 'ईसाई साधु' बनने तक का कठिन सफर।

आईए अब जानते हैं कि उन्होंने सादगी का यह अनोखा रास्ता कैसे चुना।

 बिना पैसों और सामान के यात्रा

सुंदर सिंह ने ईसाई धर्म तो अपना लिया, लेकिन उन्होंने पश्चिमी लोगों की तरह कोट-पैंट नहीं पहने। उन्होंने हमारे भारत के पारंपरिक साधुओं की तरह भगवा रंग का चोला पहन लिया। उन्होंने तय किया कि वह कोई आम इंसान वाली जिंदगी नहीं जिएंगे।

उनके पास कोई बैंक अकाउंट नहीं था, कोई सूटकेस नहीं था। उनके हाथ में सिर्फ एक छोटी सी किताब होती थी (बाइबिल का नया नियम) और कंधे पर एक पतला सा कंबल। और सबसे हैरानी की बात—उनके पैरों में जूते भी नहीं होते थे! वह नंगे पैर ही मीलों का लंबा सफर तय करते थे।

जैसा कि मैंने अनुभव किया है, जब हम बिना पैसों के घर से निकलते हैं, तो हमें सबसे पहला डर यही लगता है कि हम खाएंगे क्या? रहेंगे कहां? अगर बीमार हो गए तो क्या होगा?

लेकिन साधु सुंदर सिंह को यह डर बिल्कुल नहीं था। वह गांवों, कस्बों और घने जंगलों से पैदल गुजरते थे। रास्ते में जो कुछ भले लोग खाने को दे देते, वह वही खा लेते। अगर कोई घर में रुकने की जगह दे देता, तो ठीक, वरना वह किसी पेड़ के नीचे या किसी पहाड़ी गुफा में मजे से सो जाते। उन्हें कभी कल की चिंता नहीं सताती थी।

 खतरों से भरा तिब्बत का सफर

मुझे लगता है कि उनके जीवन का सबसे रोमांचक और डरावना हिस्सा उनकी तिब्बत यात्राएं हैं। उन दिनों तिब्बत जाना आज की तरह आसान नहीं था। न कोई पक्की सड़क थी, न गाड़ियां। हिमालय के ऊंचे बर्फीले पहाड़, खतरनाक जंगली जानवर और लुटेरों का डर हर कदम पर रहता था। वहां का मौसम हड्डियों को गला देने वाला होता था।

ऊपर से वहां के लोग बाहरी लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। सुंदर सिंह जब वहां धर्म और शांति की बातें करने गए, तो कई बार उन्हें मारा-पीटा गया। उन्हें गालियां दी गईं। एक बार की कहानी तो सच में रोंगटे खड़े कर देती है।

तिब्बत के एक इलाके में उन्हें पकड़कर एक सूखे कुएं में फेंक दिया गया था। उस कुएं में पहले से ही कई मरे हुए इंसानों की सड़ी-गली हड्डियां और कंकाल पड़े थे। ऊपर से कुएं का ढक्कन बंद कर दिया गया और उस पर एक मजबूत ताला लगा दिया गया। तीन दिन तक वह उस अंधेरे, बदबूदार कुएं में बिना कुछ खाए-पिए पड़े रहे। कोई आम इंसान होता तो शायद पागल हो जाता या डर से मर जाता।

लेकिन चमत्कार देखिए! तीसरी रात किसी अनजान इंसान ने कुएं का ढक्कन खोला और एक रस्सी नीचे लटकाई। सुंदर सिंह ने वह रस्सी पकड़ी और बाहर आ गए। जब उन्होंने ऊपर आकर मुड़कर देखा, तो वहां कोई इंसान नहीं था। उनका मानना था कि भगवान ने खुद किसी फरिश्ते को भेजकर उनकी जान बचाई। यह वाकया हमें बताता है कि जब इंसान अपना सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ देता है, तो उसकी रक्षा भी वहीं से होती है।

 पश्चिमी देशों में सादगी का डंका

उनकी सादगी, उनका त्याग और उनकी सच्ची बातों की चर्चा धीरे-धीरे भारत से बाहर पूरी दुनिया में फैलने लगी। दुनिया भर के लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए तरसने लगे।

वह बिना पैसों के ही इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई बड़े देशों में गए। अब आप सोचेंगे कि बिना पैसों के वह विदेश कैसे गए? दरअसल, लोग उनकी बातों से इतने प्रभावित थे कि वे खुद उनकी यात्रा का पूरा खर्च उठाते थे।

जब वह पश्चिमी देशों में जाते, तो वहां के लोग उनकी वेशभूषा देखकर हैरान रह जाते। नंगे पैर, भगवा चोला और चेहरे पर एक अजीब सी चमक। जब वह विदेशों में बड़े-बड़े आलीशान होटलों या महलों में रुकते, तो भी उनका रहन-सहन बिल्कुल नहीं बदलता था। वह मखमली गद्दों और नर्म बिस्तरों पर सोने के बजाय, उन्हें हटा देते और जमीन पर अपना वही पुराना कंबल बिछाकर सो जाते थे।

यह कोई दिखावा या नाटक नहीं था। यह उनके अंदर की असली सादगी थी जो उनके खून में बस चुकी थी। मैंने देखा है कि आजकल लोग थोड़ा सा नाम या पैसा कमा लेते हैं, तो उनके शौक आसमान छूने लगते हैं। उनके कपड़ों के ब्रांड बदल जाते हैं। लेकिन सुंदर सिंह ने दुनिया भर की शोहरत मिलने के बाद भी अपना वह सूती भगवा चोला नहीं छोड़ा।

 प्रकृति से सीखी गहरी बातें

साधु सुंदर सिंह बहुत ही साधारण तरीके से अपनी बात लोगों को समझाते थे। वह बड़े-बड़े और भारी शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते थे। वह लोगों को प्रकृति के छोटे-छोटे उदाहरण देते थे, जिससे बात सीधे दिल में उतर जाती थी।

वह अक्सर कहते थे कि जब हम एक छोटे से पक्षी को हवा में उड़ते हुए देखते हैं, तो क्या वह अपना खाना अपने साथ बांधकर ले जाता है? नहीं। उसे पूरा भरोसा होता है कि प्रकृति उसका पेट भर देगी। यही पक्का विश्वास सुंदर सिंह का भी था।

उन्होंने एक बार कहा था कि पानी का अपना कोई आकार या रंग नहीं होता। उसे जिस बर्तन में डालो, वह वैसा ही बन जाता है। ठीक वैसे ही हमें भी जीवन के हर हालात में खुद को ढाल लेना चाहिए। चाहे महलों का सुख मिले या कुएं का अंधेरा, इंसान का मन शांत रहना चाहिए। उनकी इन सरल बातों ने दुनिया भर के लाखों लोगों का नजरिया बदल दिया।

 हिमालय की बर्फीली वादियों में आखिरी सफर

साल 1929 की बात है। उनकी उम्र करीब 40 साल हो चुकी थी। उनका शरीर लगातार यात्राओं और बीमारियों की वजह से काफी कमजोर हो गया था। उनके दोस्तों और जानने वालों ने उन्हें बहुत रोका और कहा कि अब उन्हें आराम करना चाहिए।

लेकिन साधु सुंदर सिंह कहां रुकने वाले थे! उन्होंने कहा कि उन्हें एक बार फिर तिब्बत के लोगों के बीच जाना है। वह अपनी उसी पुरानी सादगी के साथ, नंगे पैर हिमालय के उन खतरनाक और बर्फीले पहाड़ों की तरफ निकल पड़े।

उसके बाद वह कभी लौटकर नहीं आए। किसी को आज तक नहीं पता चला कि उनका क्या हुआ। क्या वह किसी बर्फीले तूफान में फंस गए? क्या उन्हें किसी जंगली जानवर ने अपना शिकार बना लिया? या फिर किसी ने उन्हें मार दिया? यह आज भी एक बहुत बड़ा रहस्य है। वह हमेशा के लिए उन शांत पहाड़ों में कहीं विलीन हो गए।

आज के समय में जब हम अपनी हर छोटी-बड़ी चीज के लिए गैजेट्स, सुख-सुविधाओं और पैसों पर पूरी तरह निर्भर हैं, तो साधु सुंदर सिंह की यह कहानी एक ठंडी हवा के झोंके जैसी लगती है।

मुझे लगता है कि उनकी जिंदगी हमें साफ शब्दों में यह सिखाती है कि खुश रहने के लिए हमें बहुत सारे सामान, महंगे कपड़ों या बैंक बैलेंस की जरूरत नहीं है। असली शांति और खुशी हमारे अपने अंदर होती है, हमारी सोच में होती है। जब हम अपनी जरूरतों को कम कर लेते हैं, तो जिंदगी का सफर बहुत आसान और खूबसूरत हो जाता है।

तो मेरे प्यारे दोस्तों! यह थी एक ऐसे इंसान की कहानी जिसने सादगी को सिर्फ मंच से नहीं बोला, बल्कि अपनी असल जिंदगी में हर दिन जीकर दिखाया। अगली बार जब आप अपने किसी सफर के लिए बहुत सारा फालतू सामान पैक कर रहे हों, तो एक पल के लिए रुकिएगा और इस 'ईसाई साधु' की नंगे पैर वाली यात्रा को जरूर याद कीजिएगा!

क्या आपकी जिंदगी में भी कभी ऐसा पल आया है जब आपने सादगी का अनुभव किया हो? मुझे नीचे कमेंट्स में जरूर बताएं!

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