मेरे प्यारे दोस्तों, कैसे हैं आप सब? आज मैं आपके साथ एक ऐसी बात साझा करना चाहता हूँ जिसने न केवल मेरी सोच बदली, बल्कि मुझे जीवन को एक बिल्कुल नए नजरिए से देखने का मौका दिया। हम अक्सर अपनी लाइफ में बहुत कुछ हासिल करना चाहते हैं—नाम, शोहरत, पैसा। और जब हमें ये मिल जाता है, तो कहीं न कहीं हमारे अंदर एक 'अहंकार' आ जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक महान संत, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी नंगे पैर हिमालय की पहाड़ियों और जंगलों में बिता दी, उन्होंने विनम्रता को लेकर क्या सोचा होगा? मैं बात कर रहा हूँ 'साधु सुंदर सिंह' की। उन्हें 'एपोस्टल ऑफ द ब्लीडिंग फीट' यानी 'लहूलुहान पैरों वाले प्रेरित' कहा जाता था। उनके पास कहने को तो कुछ नहीं था, न घर, न पैसा, लेकिन उनके पास जो शांति थी, वह आज के बड़े-बड़े अरबपतियों के पास भी नहीं है। उन्होंने 'पाँव की धूल' का एक ऐसा उदाहरण दिया था, जो सीधे दिल को छू जाता है। आईए अब जानते हैं कि आखिर वह किस्सा क्या था और उसका हमारे जीवन से क्या लेना-देना है। साधु सुंदर सिंह और वह सादा जीवन साधु सुंदर सिंह का व्यक्तित्व ऐसा ...