मेरे प्यारे दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी यात्रा पर ले जाना चाहता हूँ जिसने न केवल एक इंसान की जिंदगी बदल दी, बल्कि दो महान देशों के प्रति उनके नजरिए को भी पूरी तरह से नया रूप दे दिया। हम बात कर रहे हैं साधु सुंदर सिंह की। लुधियाना के उस अमीर सिख परिवार के लड़के की कहानी तो आपने सुनी ही होगी, जिसने सब कुछ त्याग कर मसीह की राह चुनी और हाथ में कंबल और बाइबल लेकर हिमालय की बर्फीली वादियों में निकल पड़ा। लेकिन आज मैं आपको उनके तिब्बत के किस्सों से थोड़ा दूर, पूर्व के दो बड़े देशों—चीन और जापान की उनकी यात्रा के बारे में बताना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि सुंदर सिंह की यह यात्रा उनके जीवन का वह हिस्सा है जिसे अक्सर लोग भूल जाते हैं, जबकि यहाँ उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया, वह आज भी उतना ही सच लगता है। जब साधु सुंदर सिंह पहुंचे उगते सूरज के देश 'जापान' बात 1918 की है। जब सुंदर सिंह जापान की धरती पर उतरे, तो उनके मन में वहां के लोगों को जानने की बड़ी उत्सुकता थी। मैंने उनकी डायरियों और लेखों में पढ़ा है कि वे जापानियों की फुर्ती और उनके अनुशासन से बहुत प्रभावित थे। आईए अब जानते हैं...